लापरवाही साबित होने पर ही मिलता है मुआवजा, कई परिवार रह जाते हैं वंचित
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 1 अप्रैल : देशभर में इलेक्ट्रोक्यूशन (करंट लगने) से होने वाली मौतें एक गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा चुनौती बनती जा रही हैं। राजस्थान में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां वित्तीय वर्ष 2025-26 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले एक साल में 236 लोगों की मौत करंट लगने से हुई, जबकि औसतन हर साल यह संख्या 150 से 250 के बीच रहती है।
राज्य के ऊर्जा विभाग और स्थानीय रिपोर्ट्स के विश्लेषण से स्पष्ट है कि करीब 70 से 80 प्रतिशत हादसे ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं। उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ जैसे जिलों में खेतों में मोटर पंप, जर्जर बिजली लाइनें और बरसात के दौरान करंट फैलने से जोखिम बढ़ जाता है। इन जिलों में ही पिछले एक साल में करीब 189 मौतें दर्ज की गईं। वहीं जयपुर और जोधपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में निर्माण कार्य के दौरान हाईटेंशन लाइनों की चपेट में आने के मामले सामने आए हैं।त्र
मुआवजा नीति अस्पष्ट, परिवारों को राहत में देरी
करंट से मौत के मामलों में मुआवजा तयशुदा नहीं है। यदि बिजली विभाग की लापरवाही सिद्ध हो जाती है, तो सामान्यतः ₹4 लाख से ₹10 लाख तक मुआवजा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री सहायता कोष से ₹1 से ₹5 लाख तक की आर्थिक मदद भी दी जाती है। हालांकि, अधिकांश मामलों में लापरवाही साबित न होने से कई पीड़ित परिवार मुआवजे से वंचित रह जाते हैं। एवीवीएनएल के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार “बिजली लाइनों के रखरखाव और सुरक्षा मानकों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। अधिकांश हादसे उपभोक्ता स्तर पर असुरक्षित उपयोग, अवैध कनेक्शन या सावधानी की कमी के कारण होते हैं। विभाग जागरूकता अभियान भी चला रहा है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित लाइन मेंटेनेंस, समय पर फॉल्ट रिपेयर और ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा जागरूकता बढ़ाने से इन मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
जिलेवार ट्रेंड
उदयपुर संभाग (उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर): 110 मौतें
भीलवाड़ा-चित्तौड़गढ़ बेल्ट: 79 मौतें
जयपुर-जोधपुर शहरी क्षेत्र: 47 मौतें