जनता ने वोट दिया, अब पार्टियां अपने ही प्रत्याशियों को संभाल रही हैं… सवाल सिर्फ खरीद-फरोख्त का नहीं, भरोसे और ईमान का भी है
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 12 सितंबर: उदयपुर में नगर निगम के 80 वार्डों के लिए चुनाव हो चुका है। 220 प्रत्याशी मैदान में थे। 39 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था, जबकि 41 वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय रहा। यानी जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है। अब फैसला मतपेटियों से निकलना बाकी है। लेकिन राजनीति ने उससे पहले ही अपना एक अलग खेल शुरू कर दिया है—बाड़ाबंदी का खेल।
मतदान खत्म होते ही प्रत्याशी अचानक इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्हें जनता के बीच नहीं, बल्कि पार्टी की निगरानी में रखने की जरूरत महसूस होने लगती है। कहीं होटल, कहीं रिसॉर्ट, कहीं धार्मिक यात्रा तो कहीं किसी गोपनीय ठिकाने का सहारा। तर्क वही पुराना—’खरीद-फरोख्त रोकनी है’, ‘क्रॉस वोटिंग रोकनी है’, ‘अपने पार्षदों को बचाना है।’
लेकिन जरा ठहरकर सोचिए। जिस प्रत्याशी से चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी कह रही थी कि वह जनता की सेवा करेगा, उसी प्रत्याशी पर चुनाव के बाद पार्टी को भरोसा क्यों नहीं रह जाता? उदयपुर की जनता ने इन प्रत्याशियों को इसलिए वोट दिया है कि वे उसके वार्ड की आवाज बनेंगे। नाली, सड़क, सफाई, यातायात, पार्क, पानी और शहर की बुनियादी समस्याओं पर निर्णय लेंगे। लेकिन चुनाव परिणाम आने से पहले ही यदि राजनीतिक दल यह मानकर चलें कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि कुछ ‘ऑफर’ मिलते ही पाला बदल सकता है, तो सवाल प्रत्याशी से पहले राजनीतिक व्यवस्था की नीयत और प्रशिक्षण पर उठता है।
यहां कटाक्ष की गुंजाइश भी खूब है।
चुनाव से पहले प्रत्याशी कहते हैं— ‘मुझ पर भरोसा कीजिए।’
जनता भरोसा कर लेती है।
चुनाव के बाद पार्टी कहती है—
‘इस पर भरोसा मत करना, इसे संभालकर रखना!’
अब जनता किस पर भरोसा करे?
उदयपुर में इस बार चुनावी तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं रही। टिकट वितरण से लेकर बागियों तक की चर्चा रही। प्रमुख दलों के कई प्रत्याशियों के सामने निर्दलीय और दूसरे दलों के उम्मीदवार मैदान में रहे। यानी जिस लोकतंत्र में मतदाता को विकल्प देने की बात की जाती है, उसी लोकतंत्र में परिणाम आते ही ‘एक-एक वोट बचाने’ की चिंता शुरू हो जाती है। असल चिंता यहीं है।
क्या पार्षद पार्टी का प्रतिनिधि है या जनता का?
अगर वह पार्टी का प्रतिनिधि है तो उसे जनता के वोट की जरूरत क्यों? और अगर वह जनता का प्रतिनिधि है तो उसे किसी होटल की चारदीवारी में रखने की जरूरत क्यों? बाड़ाबंदी के समर्थक कह सकते हैं कि यह राजनीति की मजबूरी है। खरीद-फरोख्त रोकने के लिए यह जरूरी है। मान लिया। लेकिन फिर दूसरा सवाल खड़ा होता है—क्या राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय उनकी निष्ठा, विचारधारा और चरित्र की कोई कसौटी तय नहीं की थी? अगर की थी तो बाड़ाबंदी क्यों? और अगर नहीं की थी तो टिकट देने की प्रक्रिया पर सवाल क्यों नहीं?
उदयपुर की राजनीति में यह सवाल और महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यहां का नगर निगम सिर्फ 80 वार्डों का आंकड़ा नहीं है। यह झीलों के शहर की स्थानीय सरकार है। शहर की सड़कें, सफाई, अतिक्रमण, पार्किंग, कचरा, नालियां, झीलों का संरक्षण और नागरिक सुविधाएं—इन सबका सीधा संबंध इसी निगम से है। ऐसे में जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके द्वारा चुना गया पार्षद वार्ड की समस्या पर फैसला करेगा या होटल के कमरे में पार्टी के निर्देश पर? बाड़ाबंदी का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जनता पांच साल तक अपने पार्षद को खोजती है, लेकिन चुनाव परिणाम के आसपास पार्टियां अपने पार्षद को एक दिन भी अकेला छोड़ना नहीं चाहतीं।
जनता कहती है— ‘पार्षद जी, वार्ड में आइए।’ पार्टी कहती है— ‘नहीं, पहले हमारे साथ चलिए।’ और लोकतंत्र शायद चुपचाप पूछता है— ‘आखिर मैं किसके साथ चलूं?’
बाड़ाबंदी सिर्फ होटल की चारदीवारी नहीं है। यह राजनीतिक अविश्वास की दीवार है। यह बताती है कि दल अपने ही लोगों को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। और जहां भरोसा कमजोर होता है, वहां ईमानदारी पर सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है।
सबसे मजेदार स्थिति तब बनती है जब दोनों बड़े दल एक-दूसरे पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाते हैं और दोनों अपने-अपने प्रत्याशियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाते हैं। यानी बीमारी का आरोप दोनों एक-दूसरे पर लगा रहे हैं, लेकिन दवा दोनों के पास एक ही है—बाड़ाबंदी।
फिर सवाल यह भी है कि यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि पैसे या पद के लालच में अपना मत बदल देता है तो दोषी सिर्फ वह है? या वह राजनीतिक संस्कृति भी जिम्मेदार है जिसने चुनाव को विचार और सेवा से ज्यादा संख्या और सत्ता का खेल बना दिया?
लोकतंत्र में मतदाता का वोट पांच साल के लिए किसी व्यक्ति को अधिकार देता है, किसी पार्टी को उसकी अंतरात्मा की चाबी नहीं। इसलिए उदयपुर के इस चुनाव के बाद असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं होगी कि किस दल का बोर्ड बनता है। असली परीक्षा यह भी होगी कि कितने निर्वाचित प्रतिनिधि अपने निर्णय में स्वतंत्र, अपने मतदाता के प्रति जवाबदेह और अपने विवेक के प्रति ईमानदार रहते हैं। क्योंकि चुनाव जीतना लोकतंत्र की सफलता नहीं है।
चुने जाने के बाद ईमानदार रहना लोकतंत्र की असली परीक्षा है और अगर ईमान को बचाने के लिए बाड़ लगानी पड़े, तो फिर सवाल प्रत्याशियों से ज्यादा उन दलों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने उन्हें मैदान में उतारा था— आखिर बाड़ किसके लिए है—पार्टी के वोट के लिए, पार्षद के लिए या उस ईमान के लिए, जिस पर लोकतंत्र खड़ा है?