देवशयनी से देवउठनी तक: जब मेवाड़ में उत्सव नहीं, बदल जाता है आस्था का स्वर

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चार माह तक रुक जाते हैं शहनाई के सुर, लेकिन मंदिरों में बढ़ जाती है भक्ति, कथा और लोक परंपराओं की रौनक
उदयपुर, 25 जुलाई
: आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने की मान्यता के साथ ही मेवाड़ में धार्मिक जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो जाता है। इसे केवल “देव सो गए” कहकर नहीं देखा जाता, बल्कि यह चार महीने का ऐसा काल होता है जब सामाजिक जीवन से अधिक आध्यात्मिक जीवन केंद्र में आ जाता है।
देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी) तक विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत और अन्य मांगलिक कार्य लगभग थम जाते हैं। जिन घरों में शहनाइयों की तैयारी होती थी, वहां अब भजन, कथा और व्रत की चर्चा होने लगती है। मेवाड़ में इसे संयम, साधना और श्रद्धा का समय माना जाता है।
इन चार महीनों में श्रावण के सोमवार पर शिवालयों में भक्तों का सैलाब उमड़ता है। हरियाली अमावस्या पर प्रकृति और हरियाली का उत्सव मनाया जाता है। जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण मंदिरों में मध्यरात्रि तक भक्ति का वातावरण रहता है, जबकि जलझूलनी एकादशी पर भगवान के भव्य जुलूस निकलते हैं। जैन समाज पर्युषण और संवत्सरी के माध्यम से आत्मशुद्धि और क्षमा का संदेश देता है।
मेवाड़ के पुराने राजपरिवारों और मंदिरों में भी चातुर्मास के दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान, भागवत कथा, रामकथा और संतों के प्रवचन आयोजित करने की परंपरा रही है। यही कारण है कि यह समय उत्सवों की कमी का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि का माना जाता है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी पर जब भगवान विष्णु के जागने की मान्यता होती है, तब तुलसी विवाह के साथ मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होता है। इसके बाद पूरे मेवाड़ में विवाह समारोहों की रौनक लौट आती है और शहनाइयों की गूंज फिर सुनाई देने लगती है।
पंडित प्रदीप द्विवेदी बताते हैं, चातुर्मास का संदेश यही है कि जीवन में कुछ समय बाहरी उत्सवों के बजाय आत्मचिंतन, संयम और ईश्वर भक्ति के लिए भी निकालना चाहिए। यही परंपरा सदियों से मेवाड़ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।