भारतीय दर्शन में गणेश-प्रतीकवाद : प्रतीक से परमतत्त्व तक

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हरिदत्त शर्मा
भारतीय सांस्कृतिक चिन्तन-परम्परा में गणेश जी का स्थान अद्वितीय एवं सर्वोपरि है। वे मात्र आराध्य देवता नहीं, अपितु एक सम्पूर्ण दार्शनिक प्रतीक-व्यवस्था के मूर्तिमन्त स्वरूप हैं। शास्त्रों में उन्हें प्रथम पूज्य की संज्ञा प्रदान की गई है — कोई भी शुभ कार्य, यज्ञानुष्ठान अथवा नवीन उपक्रम गणपति-वन्दना के बिना अपूर्ण माना जाता है। यह प्रथा केवल धार्मिक रूढ़ि नहीं, अपितु उस गूढ़ तात्त्विक सिद्धान्त की परिचायक है, जिसमें बुद्धि और विवेक को प्रत्येक सृजनात्मक कार्य का मूलाधार स्वीकार किया गया है।
स्वरूप की प्रतीकात्मकता
गणेश जी का सम्पूर्ण बाह्याकार गहन सांकेतिकता से आपूरित है। गजमुख बुद्धि, स्मृति तथा विवेक-शक्ति का प्रतीक है — मानव-देह पर गज-मस्तक का आरोपण, यह प्रतिपादित करता है कि लौकिक बुद्धि जब दिव्य विवेक से समन्वित होती है, तभी उसे पूर्णत्व की प्राप्ति होती है। वृहत् कर्ण श्रवणशीलता एवं मितभाषिता की शिक्षा देते हैं, तो लम्बोदर समत्व-भाव का द्योतक है — साधक को समस्त सुख-दुःखात्मक अनुभवों को सहजतापूर्वक आत्मसात् करने की क्षमता रखनी चाहिए। एकदन्त द्वैत के परे अद्वैत-तत्त्व की ओर संकेत करता है, जबकि लघु नेत्र सूक्ष्मदर्शिता एवं गहन अन्तर्दृष्टि के प्रतीक हैं। मूषक-वाहन तमोगुणी वृत्तियों तथा अहंकार पर विवेकशील बुद्धि के नियन्त्रण को अभिव्यक्त करता है।
विघ्नहर्ता एवं ॐकार-स्वरूप
गणेश जी को विघ्नेश्वर कहे जाने का गूढ़ार्थ केवल बाह्य बाधाओं के निवारण तक सीमित नहीं, अपितु अज्ञान, अहंकार तथा चित्त-चांचल्य जैसे आन्तरिक विघ्नों के परिष्करण से भी सम्बद्ध है। गणपति अथर्वशीर्ष में उन्हें साक्षात् प्रणव अर्थात् ॐ का मूर्त रूप कहा गया है — वे त्रिदेवों तथा पंचमहाभूतों के समन्वित स्वरूप स्वीकार किए गए हैं। देवनागरी-लिपि में गणेश के आकार की उनकी मूर्ति से जो साम्यता प्रतीत होती है — कुण्डलाकार शुण्ड बिन्दु का, उदर अर्धचन्द्र का तथा मस्तक-भाग तीनों मात्राओं का प्रतिनिधित्व करता है — यह उनके निराकार ब्रह्म से तादात्म्य को और भी सुदृढ़ करता है।
मूलाधार-अधिष्ठाता एवं द्वैताद्वैत-सेतु
तान्त्रिक परम्परा में गणेश जी को मूलाधार चक्र का अधिष्ठाता माना गया है — वह आधार-बिन्दु, जहाँ से कुण्डलिनी-शक्ति का ऊर्ध्वगमन प्रारम्भ होता है। इसी कारण साधना-मार्ग में उनकी वन्दना सर्वप्रथम अपेक्षित है, क्योंकि मूलाधार की स्थिरता के बिना उच्चतर चक्रों की ओर प्रगमन असम्भव है। पृथ्वी-तत्त्व से इस सम्बद्धता के कारण ही उनका शरीर स्थूल, भारी-भरकम तथा दृढ़ दर्शाया गया है। साथ ही, उनके गज-मस्तक ( प्रकृति-तत्त्व ) तथा मानव-शरीर ( पुरुष-तत्त्व ) का समन्वय सांख्य-दर्शन के मूल सिद्धान्त — प्रकृति-पुरुष-संयोग — का सांकेतिक निरूपण प्रस्तुत करता है, जिसमें अचेतन शक्ति तथा चेतन विवेक परस्पर संयुक्त होकर सृष्टि-कार्य को सम्भव बनाते हैं।
एकदन्त की गाथा एवं चतुर्भुज-प्रतीकवाद
एकदन्त होने के पीछे की पौराणिक कथा — महाभारत-लेखन हेतु स्वयं का एक दन्त तोड़कर लेखनी बनाना — त्याग और ज्ञान-संप्रेषण के अभिन्न सम्बन्ध को उद्घाटित करती है। दूसरे दन्त का परशु द्वारा खण्डन अहंकार-विनाश का प्रतीक माना गया है। गणेश जी के चतुर्भुजों में धारित आयुध भी गम्भीर निहितार्थ रखते हैं — पाश इच्छा-नियन्त्रण का, अंकुश चंचल मन के अनुशासन का, वरद -मुद्रा करुणा का, तथा अभय-मुद्रा निर्भयता का प्रतीक है। इन चारों के समन्वय से ही सम्पूर्ण साधना सिद्ध होती है।
सिद्धि-बुद्धि तथा शुभ-लाभ
गणेश जी की अर्धांगिनियाँ — सिद्धि और बुद्धि — इस तथ्य की सूचक हैं कि किसी भी कार्य की पूर्णता हेतु विवेकसम्मत बुद्धि एवं सफलतापरक सिद्धि, दोनों का समन्वय अनिवार्य है। उनके पुत्र शुभ तथा लाभ इंगित करते हैं कि साधना का फल केवल भौतिक लाभ में नहीं, अपितु शुभत्व में भी परिणत होना चाहिए — यहाँ धर्मानुकूल अर्थ को ही वास्तविक समृद्धि मानने वाला भारतीय अर्थशास्त्रीय चिन्तन प्रतिबिम्बित होता है।
दूर्वा-मोदक का प्रतीकवाद
गणेश जी को प्रिय दूर्वा विनम्रता तथा सहनशीलता की शिक्षा देती है, जबकि मोदक आत्मानन्द का प्रतीक है — बाह्य आवरण की कठिनता के भीतर आन्तरिक मधुरता का सन्देश, जो साधना-पथ की दुष्करता के पश्चात् प्राप्त होने वाले ब्रह्मानन्द की उपमा प्रस्तुत करता है।
सूक्ष्म चेतना का स्थूल जगत् में विस्तार
सम्पूर्ण विवेचन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि गणेश जी सूक्ष्म चेतना का स्थूल जगत् में अवतरण हैं — निराकार ब्रह्म का वह साकार, सुगम एवं सर्वसुलभ रूप, जिसकी उपासना सामान्यजन से लेकर परमहंस तक सभी कर सकते हैं। अतः वे केवल प्रथम पूज्य ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि-प्रक्रिया के तात्त्विक उद्गम-बिन्दु स्वरूप प्रतिष्ठित हैं, जहाँ से बुद्धि, विवेक, शक्ति तथा सिद्धि की समस्त धाराएँ प्रवाहित होकर मानव-जीवन को सम्यक् दिशा प्रदान करती हैं। _इस प्रकार उनका सम्पूर्ण स्वरूप एक जीवन्त दार्शनिक प्रतीक है, जो विवेक, धैर्य, विनम्रता एवं एकाग्रता के समन्वित अभ्यास द्वारा जीवन के प्रत्येक विघ्न को पार करने तथा सिद्धि प्राप्त करने का सनातन सन्देश देता है।