कचरे के ढेर बिगाड़ रहे उदयपुर की वैश्विक छवि

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सूखा-गीला कचरा अलग नहीं, चौराहों से पर्यटन स्थलों तक बदहाल सफाई व्यवस्था; विशेषज्ञ बोले— वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन के बिना ‘स्वच्छ शहर’ का सपना अधूरा
उदयपुर, 21 जुलाई:
झीलों और पर्यटन नगरी के रूप में दुनिया भर में पहचान रखने वाले स्मार्ट सिटी उदयपुर की स्वच्छता व्यवस्था इन दिनों सवालों के घेरे में है। शहर के कई प्रमुख चौराहों, बाजारों, आवासीय क्षेत्रों और पर्यटन स्थलों के आसपास कचरे के ढेर आम दृश्य बन गए हैं। हालात यह हैं कि कहीं डोर-टू-डोर संग्रहण समय पर नहीं हो रहा तो कहीं एकत्रित कचरा घंटों तक खुले में पड़ा रहता है। इससे दुर्गंध फैल रही है और शहर की खूबसूरत छवि पर भी दाग लग रहा है।


सबसे गंभीर स्थिति यह है कि नगर निगम की ओर से सूखे और गीले कचरे का पृथक संग्रहण प्रभावी रूप से नहीं कराया जा रहा। अधिकांश स्थानों पर दोनों तरह का कचरा एक ही वाहन में एकत्र किया जा रहा है। स्वच्छता विशेषज्ञों का कहना है कि जब स्रोत स्तर पर ही कचरा अलग नहीं होगा तो न तो कम्पोस्ट तैयार हो सकेगा और न ही प्लास्टिक, कागज व अन्य सामग्री का पुनर्चक्रण संभव होगा। इससे पूरा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र विफल हो जाता है।
सोमवार को नगर निगम के ट्रांसफर स्टेशन पर भी व्यवस्था चरमरा गई। चारों कैप्सूल भर जाने से शहरभर से कचरा लेकर पहुंचे ऑटो टिपर घंटों तक कतार में खड़े रहे। तीतरड़ी ट्रेंचिंग ग्राउंड पर निस्तारण मशीन खराब होने से कचरा समय पर खाली नहीं हो पाया, जिसका सीधा असर शहर की सफाई व्यवस्था पर पड़ा।
उधर, दूधतलाई जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल पर पहाड़ी क्षेत्र में खुलेआम व्यावसायिक कचरा डाला जा रहा है। इसी मार्ग से प्रतिदिन हजारों पर्यटक करणी माता मंदिर, माणिक्यलाल वर्मा पार्क और पिछोला झील का नजारा देखने पहुंचते हैं। लेकिन उनका स्वागत प्राकृतिक सौंदर्य के बजाय बदबू और कचरे के ढेर करते हैं। पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे दृश्य उदयपुर की अंतरराष्ट्रीय पहचान को नुकसान पहुंचाते हैं और पर्यटकों के मन में शहर की स्वच्छता को लेकर नकारात्मक संदेश छोड़ते हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि नगर निगम ने स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण, नियमित संग्रहण, ट्रेंचिंग ग्राउंड की व्यवस्था और पर्यटन स्थलों की विशेष सफाई पर तत्काल ध्यान नहीं दिया, तो स्मार्ट सिटी का दावा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।