गवरी का आगाज, शुरू हुई भील समाज की लोकनाट्य परंपरा

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रक्षाबंधन के बाद ठंडी राखी पर कालिका माता मंदिर में गवरी की रस्म, कलाकारों ने धारण किया गवरी वेश
उदयपुर, 29 अगस्त
: मेवाड़ की भील समाज की प्राचीन लोकनाट्य परंपरा गवरी का शनिवार को मेनार में शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना के साथ आगाज हुआ। रक्षाबंधन के बाद ठंडी राखी के अवसर पर कालिका माता मंदिर में विधि-विधान से पूजा के बाद गवरी खेलने की पारंपरिक रस्म पूरी की गई। माता के सेवक हरिराम भील सहित गवरी कलाकारों ने कालिका माता की आराधना कर गवरी धारण की।
पूजा के बाद कलाकारों ने ढोल, थाली और मांदल की थाप पर शोभायात्रा निकाली। शोभायात्रा भगवानपुरी, पुराणपुरी, हिम्मतपुरी और महेशपुरी सहित विभिन्न क्षेत्रों से होकर गुजरी। इस दौरान ग्रामीणों ने पारंपरिक गवरी का स्वागत किया।
कठिन नियमों का करते हैं पालन
गवरी कलाकार इस अवधि में घर-परिवार से अलग रहकर व्रत और कठिन नियमों का पालन करते हैं। कलाकार मांस-मदिरा, हरी सब्जियों और हरे धनिये का सेवन नहीं करते। जूते-चप्पल पहनना, चारपाई पर सोना और ब्रह्मचर्य का पालन करना भी गवरी के नियमों में शामिल है। गवरी विसर्जन के बाद ही कलाकार अपना व्रत खोलते हैं।
गोस्वामी परिवार के घर पहुंचा कलाकारों का संघ
गवरी परंपरा के तहत कलाकार गोस्वामी परिवार के घर पहुंचे। यहां पंडित के सान्निध्य में गोरखिया माता और भगवान शिव-पार्वती की विधि-विधान से पूजा की गई। परंपरा के अनुसार हूर मारने की रस्म के बाद कलाकारों ने भगवा वेश धारण किया। गोस्वामी परिवार की ओर से कलाकारों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई।
रविवार को कालिका माता मंदिर में सवा मण नूंद की रस्म होगी। इसके बाद सोमवार से ओंकारेश्वर चौक पर गवरी का मंचन शुरू होगा। कलाकार करीब सवा महीने तक विभिन्न गांवों में जाकर पारंपरिक लोकनाट्य प्रस्तुत करेंगे।
धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का संगम
गवरी केवल लोक मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भील समाज की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा अनुष्ठान है। मान्यता है कि गोरखिया माता सवा महीने तक धरती पर भ्रमण करती हैं। अच्छी बारिश, फसल, पशुधन और जनजीवन की खुशहाली की कामना के साथ गवरी का आयोजन किया जाता है। गवरी में बूढ़िया, राई, मीणा-बंजारा, हटिया, कालका, कान्हा-गूजरी, दाणीजी और बादशाह की सवारी जैसे पारंपरिक खेल प्रमुख आकर्षण रहते हैं। सभी पात्र पुरुष कलाकार ही निभाते हैं। ढोल, थाली और मांदल की थाप पर सदियों पुरानी मेवाड़ी लोक संस्कृति जीवंत होती है।