भूमि उपयोग, निर्माण और पर्यटन गतिविधियों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर ग्रामीणों में असमंजस
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 15 जून: कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) में शामिल 94 गांवों के लोगों की चिंता अब जोनल मास्टर प्लान (ZMP) को लेकर बढ़ने लगी है। केंद्र सरकार द्वारा कुंभलगढ़ अभयारण्य के आसपास के क्षेत्र को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित किए जाने के बाद अब राजस्थान सरकार को दो वर्ष के भीतर जोनल मास्टर प्लान तैयार करना है। इसी योजना में भविष्य के भूमि उपयोग, निर्माण गतिविधियों, पर्यटन निवेश और ग्रामीण विकास की दिशा तय होगी।
ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं है कि मास्टर प्लान लागू होने के बाद कृषि भूमि, आवासीय निर्माण, फार्म हाउस, रिसॉर्ट और अन्य गतिविधियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कई गांवों में लोगों को आशंका है कि भविष्य में जमीन के उपयोग और निर्माण स्वीकृतियों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
पर्यटन क्षेत्र भी कर रहा स्पष्टता का इंतजार
होटल कारोबार से जुड़े अभिमन्यु सिंह का कहना है कि कुंभलगढ़-केलवाड़ा पर्यटन बेल्ट में होटल, रिसॉर्ट और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग भी जोनल मास्टर प्लान का इंतजार कर रहे हैं। क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन निवेश तेजी से बढ़ा है, लेकिन ESZ लागू होने के बाद नए निवेश और विस्तार योजनाओं को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
ग्रामीणों की मुख्य चिंता
सेमा के ग्रामीण पूनम सिंह का कहना है कि यदि मास्टर प्लान बनाते समय स्थानीय लोगों की राय नहीं ली गई तो भविष्य में भूमि हस्तांतरण, मकान निर्माण, सड़क विकास और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जुड़े कार्य प्रभावित हो सकते हैं। लोगों की मांग है कि योजना तैयार करने से पहले ग्राम सभाओं और जनप्रतिनिधियों से व्यापक चर्चा की जाए।
इधर, सेवानिवृत्त वन अधिकारी योगेश शर्मा बताते हैं कि इको-सेंसिटिव ज़ोन अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि खेती, पशुपालन, पारंपरिक ग्रामीण गतिविधियों और मौजूदा भूमि उपयोग पर कोई तत्काल प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। हालांकि भविष्य की विकास गतिविधियां जोनल मास्टर प्लान के अनुरूप संचालित होंगी।
निर्णायक होगा आगामी मास्टर प्लान
विशेषज्ञों का मानना है कि कुंभलगढ़ क्षेत्र के लिए बनने वाला जोनल मास्टर प्लान केवल पर्यावरण संरक्षण का दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह 94 गांवों के सामाजिक, आर्थिक और पर्यटन विकास की दिशा भी तय करेगा। ऐसे में ग्रामीणों, पर्यटन उद्योग और प्रशासन के बीच संवाद बनाना आवश्यक होगा, ताकि संरक्षण और विकास के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।