स्वामिभक्ति, शक्ति और स्वाभिमान का प्रतीक है घोड़ा; राजस्थान में 33,679 अश्व, उदयपुर में 1,013
उदयपुर, 18 अक्टूबर: महानवमी पर शक्ति और शस्त्र पूजन के साथ घोड़ों की पूजा की परंपरा मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, नवानिया के जनस्वास्थ्य विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुरेंद्र छंगाणी के अनुसार, विशेष रूप से मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों का पूजन शक्ति, स्वामिभक्ति, स्वाभिमान और समर्पण के प्रतीक के रूप में किया जाता है। आधुनिक युद्ध पद्धतियों में बदलाव के बावजूद कृषि, सवारी और भार ढोने में घोड़ों की उपयोगिता बनी हुई है। कई परिवारों की आजीविका भी अश्व पालन पर निर्भर है।
पितृकुल से जुड़ी है नस्ल की पहचान
डॉ. छंगाणी ने बताया कि लोक मान्यताओं के अनुसार घोड़े की नस्ल, चाल और स्वभाव पर उसके पिता के कुल का विशेष प्रभाव माना जाता है। राजस्थान की कहावत ‘नर नानेरै, घोड़ा दादेरै’ इसी मान्यता को दर्शाती है। मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों ने अपनी विशेषताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। राजस्थान के लोकगीतों, कहावतों और दोहों में भी अश्व की वीरता और तेज गति का उल्लेख मिलता है।
राजस्थान में देश के करीब 10 प्रतिशत अश्व
पशुधन गणना-2019 के अनुसार भारत में करीब 3.42 लाख घोड़े और पोनी हैं। इनमें लगभग 33,679 राजस्थान में हैं। देश में अश्वों की संख्या के मामले में राजस्थान तीसरे स्थान पर है, जबकि उदयपुर जिले में करीब 1,013 घोड़े और पोनी दर्ज हैं। राजस्थानी लोक साहित्य में तेज घोड़े की सवारी को गौरव और आनंद से जोड़ा गया है। एक प्रसिद्ध दोहे में घोड़े की पीठ को ‘स्वर्ग की निशानी’ बताया गया है। डॉ. छंगाणी ने अश्वों के संरक्षण, संवर्धन और विकास के लिए सामूहिक प्रयास करने का आह्वान किया।