एमएलएसयू में शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भर भारत पर मंथन, विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता बताई
उदयपुर, 17 अप्रैल: मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय में आयोजित “भारतीय ज्ञान परंपरा : एक संवाद” विषयक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का समापन गोल्डन जुबली गेस्ट हाउस में दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। समापन सत्र में देश-विदेश से जुड़े शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत, संस्कार आधारित शिक्षा और आधुनिक युग में उसकी प्रासंगिकता पर विचार साझा किए।विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार वी.सी. गर्ग ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध परंपरा है। हमारे शास्त्रों में विद्या को मुक्ति का माध्यम माना गया है और जीवन का अंतिम लक्ष्य मानव कल्याण है। उन्होंने गुरुकुल शिक्षा पद्धति को भारतीय संस्कृति की आधारशिला बताया। मुख्य अतिथि प्रो. योगेश कुमार ने भारतीय परंपरा को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला। वहीं प्रो. डी.एन. दानी, प्रो. हनुमान प्रसाद, प्रो. प्रभा वाजपेयी और प्रो. विजयलक्ष्मी ने शिक्षा में संस्कार, आत्मबल, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय पर बल दिया।
सेमिनार के विभिन्न तकनीकी सत्रों में भारतीय संस्कृति, योग, प्राणायाम, आत्मनिर्भरता तथा प्राचीन ज्ञान की वैज्ञानिकता जैसे विषयों पर शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय एवं अन्य संस्थानों के प्रोफेसर, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। संचालन डॉ. कुमुद पुरोहित एवं डॉ. तमन्ना सोनी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सपना मावतवाल ने दिया।