सुप्रीम कोर्ट के निर्देश—बाल यौन शोषण सामग्री दो घंटे में हटाकर पुलिस को देनी होगी सूचना, पांच साल में ऐसे मामले 26.6 गुना बढ़े
नई दिल्ली, 17 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना बेतुका है। जरूरत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करने की है। अदालत ने बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने के निर्देश दिए हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसी सामग्री हटाने के दो घंटे के भीतर पुलिस या साइबर अपराध पोर्टल को इसकी सूचना देनी होगी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की मौजूदगी के आधार पर बच्चों के लिए इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाना उचित नहीं है। ऐसी रोक बच्चों को कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म की ओर धकेल सकती है। ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना करने वाले बच्चे शिकायत करने से भी डर सकते हैं। इसलिए बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना जरूरी है।
पांच साल में 44 से बढ़कर 1171 हुए मामले
गृह मंत्रालय की ओर से 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में पेश राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, बच्चों की अश्लील तस्वीरों और वीडियो से जुड़े मामले 2018 में 44 थे, जो 2022 में बढ़कर 1171 हो गए। इसी अवधि में बच्चों के खिलाफ दर्ज साइबर अपराध के मामले 232 से बढ़कर 1823 हो गए। हालांकि, केंद्र सरकार ने 2022 के बाद के आंकड़े जारी नहीं किए हैं।
तीन विशेषज्ञ करेंगे सामग्री की जांच
राष्ट्रीय डेटाबेस में संदिग्ध सामग्री की डिजिटल पहचान यानी हैश और उस वेबसाइट का लिंक दर्ज किया जाएगा, जहां सामग्री उपलब्ध है। किसी सामग्री को डेटाबेस में शामिल करने से पहले कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से उसकी जांच करेंगे। शुरुआती स्तर पर सॉफ्टवेयर की मदद भी ली जा सकेगी।
इस व्यवस्था से सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री का डेटाबेस से मिलान कर सकेंगी। इससे पहले पहचानी जा चुकी सामग्री को दोबारा अपलोड किए जाने पर भी पकड़ने में मदद मिलेगी। अदालत ने डेटाबेस के उपयोग का रिकॉर्ड रखने, स्वतंत्र ऑडिट कराने और गलत तरीके से दर्ज सामग्री को हटाने तथा शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था बनाने के निर्देश भी दिए।
पाठ्यक्रम में शामिल होगी ऑनलाइन सुरक्षा
अदालत ने कहा कि केवल तकनीकी उपाय बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें अपनी निजी जानकारी सुरक्षित रखने, ऑनलाइन शोषण पहचानने और ऐसी स्थिति में मदद मांगने के तरीके भी सिखाने होंगे। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) तथा राज्य की शैक्षिक संस्थाओं को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों की मदद से उम्र के अनुरूप शैक्षिक सामग्री तैयार करने को कहा गया है। इसमें सहमति, स्वस्थ संबंध, सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श और शिकायत के तरीकों की जानकारी शामिल होगी।
पेड वेबसाइटों पर भी रहेगी निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने सशुल्क और सदस्यता आधारित वेबसाइटों तथा सेवाओं की भी सख्ती से जांच करने को कहा है, ताकि इनके माध्यम से बाल यौन शोषण से जुड़ी या अन्य प्रतिबंधित सामग्री दिखाई या प्रसारित न हो। केंद्र सरकार से ऐसी सामग्री से अर्जित रकम जब्त करने और उसे वापस लेने की संभावना पर विचार करने को भी कहा गया है।
केंद्र सरकार को निर्देशों के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक नियम और प्रक्रिया तय करनी होगी। जरूरत पड़ने पर सूचना प्रौद्योगिकी कानून और संबंधित नियमों में बदलाव पर भी विचार करना होगा। सरकार को हलफनामा पेश कर अब तक की कार्रवाई की जानकारी देनी है। मामले में अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी।