पूर्व सांसदों-विधायकों के रिश्तेदारों को टिकट, पूर्व मंत्री और जिलाध्यक्ष भी आजमा रहे किस्मत
उदयपुर, 20 अक्टूबर: राजस्थान के पंचायतीराज चुनाव में राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी भी अपनी सियासी जमीन तलाश रही है। कहीं पूर्व सांसद के बेटे को जिला परिषद का टिकट मिला है तो कहीं पूर्व सांसद की बहू और मौजूदा विधायक की बेटी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। पूर्व मंत्रियों, विधायकों और जिलाध्यक्षों की मौजूदगी ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। भाजपा और कांग्रेस के टिकट वितरण में राजनीतिक अनुभव के साथ पारिवारिक विरासत से जुड़े चेहरों को भी जगह मिली है।
उदयपुर में पूर्व गृहमंत्री के परिवार से लेकर पूर्व विधायक तक मैदान में
उदयपुर जिला परिषद के वार्ड 32 से राजसिंह झाला चुनाव लड़ रहे हैं। वे राजस्थान के पूर्व गृहमंत्री स्व. गुलाबसिंह शक्तावत के दोहिता और वल्लभनगर के पूर्व विधायक स्व. गजेंद्र सिंह शक्तावत के भांजे हैं। वहीं, पूर्व विधायक और वल्लभनगर से भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हिम्मत सिंह झाला वार्ड 37 से मैदान में हैं। जिला प्रमुख का पद अनारक्षित होने के चलते भाजपा ने पूर्व देहात जिलाध्यक्ष डॉ. चंद्रगुप्त सिंह चौहान को वार्ड 40 से प्रत्याशी बनाया है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व देहात जिलाध्यक्ष लालसिंह झाला को वार्ड 2 से उतारा है। दूसरी ओर, सायरा पंचायत समिति के वार्ड 9 से पूर्व खेल राज्यमंत्री डॉ. मांगीलाल गरासिया कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। उनके सामने भाजपा के थावराराम हैं। सायरा में प्रधान पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित है।
डूंगरपुर में बहू और बेटी की चुनावी पारी
डूंगरपुर में राजनीतिक परिवारों की भागीदारी के दो प्रमुख उदाहरण सामने हैं। भाजपा ने पूर्व सांसद कनकमल कटारा की बहू और सागवाड़ा की पूर्व विधायक अनिता कटारा को जिला परिषद के वार्ड 21 भीलूड़ा से प्रत्याशी बनाया है। अनिता कटारा भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की सदस्य भी हैं। वहीं, सागवाड़ा विधायक शंकरलाल डेचा की बेटी शांति प्रकाश डेंडोर ने पंचायत समिति सदस्य पद के लिए नामांकन दाखिल किया है। कांग्रेस ने पूर्व विधायक पूंजीलाल परमार को वार्ड 34 पुनाली से मैदान में उतारा है।
राजसमंद में पूर्व सांसद के बेटे को टिकट
राजसमंद में भाजपा ने पूर्व सांसद हरिओम सिंह राठौड़ के बेटे कर्णवीर सिंह को जिला परिषद चुनाव में प्रत्याशी बनाया है। इस तरह मेवाड़ और वागड़ के इन चुनावों में पूर्व सांसदों-विधायकों के बेटे, बहू और अन्य रिश्तेदार भी अपनी राजनीतिक पहचान के साथ मैदान में हैं।