अमरखजी महादेव में शनिवार को लगेगा ठंडी राखी का मेला; जल-जंगल-जमीन की रक्षा और नारी सम्मान का संदेश देंगे गवरी के खेल
उदयपुर, 28 अगस्त: मेवाड़ की समृद्ध लोक परंपरा एक बार फिर जीवंत होने जा रही है। ठंडी राखी के अवसर पर शनिवार को अमरखजी महादेव मंदिर में मेला भरेगा और इसी के साथ गवरी उत्सव की शुरुआत होगी। इसके बाद शहर से लेकर गांवों तक करीब 40 दिन तक गवरी के नृत्याभिनय और लोकनाट्य की प्रस्तुतियां होंगी। ढोल की थाप, पारंपरिक वेशभूषा और अभिनय के माध्यम से भील समाज की यह सदियों पुरानी परंपरा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है।
40 दिन तक कठिन नियमों का पालन
वरिष्ठ पत्रकार राहुल शर्मा बताते हैं, गवरी में शामिल कलाकार सवा माह तक घर से बाहर रहकर मंदिर में निवास करते हैं। इस दौरान महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष कलाकार ही निभाते हैं। कलाकारों के लिए कई कठोर नियम निर्धारित हैं। वे 40 दिन तक स्नान नहीं करते, दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं और हरी सब्जी, मांस व मदिरा का सेवन नहीं करते। नंगे पैर रहते हैं और जमीन पर ही सोते हैं। इन नियमों को गवरी की साधना का हिस्सा माना जाता है।
माता की आराधना से शुरू होंगे खेल
गवरी की शुरुआत माता की आनंद आराधना से होती है। इसके बाद भमरियां, भमरी, कालू कीर, बाबजी महाराज, मां अंबा, नाहरसिंह और हनुमानजी सहित विभिन्न पात्रों का अभिनय किया जाता है। गवरी के अलग-अलग खेलों के माध्यम से चोरी नहीं करने, पेड़ नहीं काटने, जीव हत्या से बचने और नारी शक्ति एवं सम्मान का संदेश दिया जाता है।
अरावली की गुफाओं तक जुड़ी परंपरा
गवरी को भील समाज का पारंपरिक लोकनृत्य माना जाता है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें काफी पुरानी मानी जाती हैं और अरावली क्षेत्र की गुफाओं में मिले शैल चित्रों को भी इस लोकपरंपरा से जोड़कर देखा जाता है। लोकमान्यता में गूरंज्या माता को गवरी का स्वरूप माना जाता है। करीब 40 दिन चलने वाले इस उत्सव का समापन बंजारा के खेल के साथ होता है। ठंडी राखी का मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मेवाड़ की लोक संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन से जुड़ी परंपरा का प्रतीक है। गवरी की थाप के साथ एक बार फिर जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संदेश गांव-गांव तक पहुंचेगा।