भारत माता वंदन के साथ सम्पन्न हुआ भाषा बोधन वर्ग का दीक्षांत
उदयपुर, 8 जून: संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना, ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक अस्मिता की अमर धारा है। इसी भाव को आत्मसात करते हुए संस्कृत भारती उदयपुर विभाग द्वारा आयोजित छह दिवसीय संस्कृत भाषा बोधन वर्ग का दीक्षांत समारोह 101 दीपों की पावन ज्योति, भारत माता वंदन और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत संकल्पों के साथ सम्पन्न हुआ। दीपशिखाओं के आलोक में संस्कृत संरक्षण, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रनिर्माण का सामूहिक संकल्प वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा एवं सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर गया।
हिरण मगरी सेक्टर चार स्थित विद्या निकेतन बालिका विद्यालय में आयोजित संस्कृत भाषा बोधन वर्ग का दीक्षांत समारोह रविवार प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में प्रत्येक सहभागी ने एक दीप प्रज्वलित कर भारत माता की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की तथा साष्टांग प्रणाम कर संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने और संस्कारसम्पन्न समाज निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने का प्रण लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ एकात्मता स्तोत्र के सामूहिक गान से हुआ, जिसने सम्पूर्ण वातावरण को राष्ट्रीय एकात्मता और सांस्कृतिक समरसता के भाव से गुंजायमान कर दिया। तत्पश्चात महानगर मंत्री नरेंद्र शर्मा ने भारत माता पूजन सम्पन्न करवाया।
अपने प्रेरणादायी दीक्षांत उद्बोधन में नरेंद्र शर्मा ने कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति है। यह भाषा हमारी ऋषि-परंपरा, ज्ञान-संपदा और सांस्कृतिक वैभव की संवाहक है। संस्कृत संभाषण के माध्यम से समाज में संस्कार, सद्भाव, समरसता और राष्ट्रनिष्ठा के भावों का विस्तार किया जा सकता है। उन्होंने सभी वर्गार्थियों से संस्कृत भारती के सक्रिय कार्यकर्ता बनकर संस्कृति और संस्कृत के संवर्धन हेतु समाज में सतत कार्य करने का आह्वान किया।
विभाग संयोजक दुष्यंत नागदा ने कहा कि भाषा बोधन वर्ग केवल संस्कृत शिक्षण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व परिष्कार, सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना के विकास का सशक्त साधन है। उन्होंने सभी वर्गार्थियों से आग्रह किया कि वे यहां प्राप्त ज्ञान, संस्कार और प्रेरणा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि जहां संस्कृत की वाणी जीवित है, वहां भारत की आत्मा स्पंदित है और जहां भारत की आत्मा जागृत है, वहां संस्कृति, संस्कार और राष्ट्रगौरव का प्रकाश कभी मंद नहीं पड़ता।
समारोह के अंतिम सत्र में शिविरार्थियों ने अपने वर्गानुभव साझा किए। उन्होंने छह दिवसीय प्रशिक्षण को जीवन का अविस्मरणीय एवं प्रेरणादायी अनुभव बताते हुए संस्कृत संभाषण, अनुशासन, संगठन भावना तथा भारतीय संस्कारों की प्राप्ति के लिए संस्कृत भारती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
इस अवसर पर डॉ. यज्ञ आमेटा, वर्ग संयोजक संजय शांडिल्य, शिक्षक मुकेश कुमावत, श्रेयांश कंसारा एवं गौरव साहू द्वारा वर्गार्थियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। वर्ग में मुख्य शिक्षक के रूप में श्रेयांश कंसारा तथा सह-शिक्षक के रूप में गौरव साहू ने शिक्षण दायित्व का निर्वहन किया।
प्रबंधन व्यवस्था में दिव्यांशु, मेहरान, विशाल शर्मा, लक्ष्मण, आंचल चौधरी, लारा उपाध्याय, ईशा पालीवाल एवं दिव्यांशी पालीवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं सम्पूर्ण आयोजन के संचालन एवं व्यवस्थाओं में डॉ. यज्ञ आमेटा, दुष्यंत नागदा, नरेंद्र शर्मा, चैनशंकर दशोरा, डॉ. रेनू पालीवाल, कुलदीप जोशी, मीनाक्षी द्विवेदी, केशव नागदा, पहल सहित कई कार्यकर्ताओं का सक्रिय योगदान रहा।