कहीं रावण पर बरसते हैं पत्थर, कहीं साल में दो बार होता है दहन
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 1 अक्टूबर: मेवाड़-वागड़ में विजयादशमी पर्व अपनी अनूठी परम्पराओं को लेकर देश भर में चर्चा का विषय बना रहता है। ज्यादातर इलाकों में रावण के साथ कुंभकरण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन कर यह पर्व मनाया जाता है, किन्तु मेवाड़—वागड़ में विजयादशमी पर्व के विविध रूप सामने आते हैं। कहीं सीमेंट या पत्थर के सैकड़ों साल पुराने रावण खड़े हुए हैं, जिसमें हर साल सिर बनाकर उस पर बंदूक से गोलियां, पत्थर या लाठी से हमला कर रावण को धराशायी किए जाने की परम्परा है। उदयपुर संभाग के गढ़बोर में रावण का सिर मटकियों से बनाया जाता है और पत्थरों से तोड़कर उसकी ठीकरी लोग अपने साथ घरों पर ले जाते हैं। संभाग के कपासन में तो रावण का दहन एक बार नहीं, बल्कि साल में दो बार किया जाता है।
राजसमंद जिले के गढ़बोर में रावण दहन नहीं, पत्थर बरसाने की परंपरा
दशहरे पर देशभर में रावण दहन होता है, लेकिन मेवाड़ के गढ़बोर (राजसमंद) में पांच सौ साल पुरानी अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि पत्थर बरसाकर वध किया जाता है। कस्बे के सरगरा समाज द्वारा 11 फीट ऊंचा रावण पत्थरों को जोड़कर बनाया जाता है। इसमें दस सिर नहीं होते, बल्कि तीन मटकिया लगाई जाती हैं, जिनमें कुमकुम भरा होता है। चारभुजा नाथ मंदिर की आरती के बाद शोभायात्रा निकाली जाती है और जवाहर सागर तालाब किनारे रावण पर पत्थर बरसाने की रस्म होती है। देवस्थान विभाग के कर्मचारी शुरुआत करते हैं, फिर ग्रामीण तब तक पत्थर मारते हैं जब तक रावण जमींदोज नहीं हो जाता। प्रतापगढ़ के खेरोट में गोलियों से रावण छलनी किया जाता है, जबकि झांसड़ी में उसकी नाक काटने की परंपरा है। वहीं झाड़ोल स्थित कमलनाथ शिव मंदिर में आज भी शिव से पहले रावण की पूजा होती है, क्योंकि मान्यता है कि शिव की पूजा तभी फलित होती है जब रावण की पूजा पहले की जाए।
खेरोट गांव में रावण दहन नहीं बल्कि गोलियों से होता है वध
दशहरे पर जहां पूरे देश में रावण दहन होता है, वहीं प्रतापगढ़ जिले की अरनोद तहसील के खेरोट गांव में रावण का वध बंदूक की गोलियों से करने की अनोखी परंपरा है। यहां आदर्श राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय परिसर में रावण का पुतला बनाया जाता है। पुरानी मान्यता के अनुसार खेतों में खड़ी फसल को आग से बचाने के लिए रावण जलाने की बजाय उसे गोलियों से छलनी किया जाने लगा और यह परंपरा आज तक कायम है।
रावण पर पहली गोली चलाने का सौभाग्य पाने के लिए गांव में बोली लगाई जाती है। सबसे अधिक बोली लगाने वाला पहले भगवान राम के भाले से रावण की नाक काटता है, फिर अपनी लाइसेंसी बंदूक से पहली गोली चलाता है। इसके बाद अन्य ग्रामीण भी रावण को गोलियों से छलनी करते हैं। खास बात यह है कि रावण की आरती और पूजा भी की जाती है। इस दौरान राम और रावण के दो गुट बनते हैं, जो चौपाइयों में संवाद करते और जयकारे लगाते हैं। प्रतापगढ़ जिले के आकोला गांव में भी सैकड़ों साल पुरानी अनूठी परंपरा है, जहां सीमेंट से बने रावण के धड़ पर मिट्टी का सिर रखा जाता है। दशहरे पर लोग उसका सिर लट्ठ मारकर धड़ से अलग करते हैं और सिर की ठीकरी घर ले जाते हैं। मान्यता है कि इससे घर में शांति बनी रहती है और खटमल नहीं होते।
आकोला में 600 साल से निभाई जा रही है रावण वध की परंपरा
चित्तौड़गढ़ से 65 और उदयपुर से 60 किमी दूर आकोला गांव दशहरे पर रावण वध की अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां 600 साल से भी अधिक समय से रावण दहन नहीं, बल्कि रावण का वध किया जाता है। दशहरे से एक दिन पहले कुम्हार के यहां रावण का सिर (मटका) तैयार किया जाता है, जिस पर दस मुख बनाए जाते हैं। दशहरे के दिन इस मटके को मैदान में बने स्थायी रावण के धड़ पर लगाया जाता है। शाम को छीपा समाज के चारभुजा मंदिर से राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान की बेवाण शोभायात्रा लंका मैदान (बेड़च नदी किनारे) पहुंचती है, जहां राम-रावण की सेना के बीच संवाद होता है। इसके बाद रामध्वज डंड से रावण का सिर धड़ से अलग कर वध किया जाता है। ग्रामीण सिर की ठिकरी लेने के लिए टूट पड़ते हैं, मान्यता है कि इससे घर में खटमल नहीं होते और शांति बनी रहती है। पहले ग्रामीण रावण के धड़ पर पत्थर बरसाते थे, हालांकि अब यह परंपरा समाप्त हो गई है। करीब 25 साल से यहां रावण वध के साथ रावण दहन भी शुरू किया गया है। धड़ के पास ही दूसरा पुतला जलाया जाता है। दशहरे पर यहां 10 हजार से अधिक लोग जुटते हैं और दो दिन का मेला लगता है। कोरोना काल में केवल रावण वध की रस्म निभाई गई थी।
कपासन में साल में दो बार होता है रावण दहन
कपासन कस्बे में रावण दहन की अनोखी परंपरा पिछले 7 सालों से साल में दो बार निभाई जा रही है। पहले सिर्फ नगरपालिका के दशहरे मेले में रावण का पुतला जलाया जाता था, लेकिन अब चैत्र नवरात्रि पर प्राचीन शक्तिपीठ मूला माता मंदिर के दस दिवसीय मेले के समापन पर भी रावण दहन किया जाता है। यह परंपरा वर्ष 2015 में शुरू हुई, जब दशहरा मेले में पुतले में आग न लगने पर मेला कमेटी अध्यक्ष पार्षद सत्यनारायण आचार्य ने मूला माता से प्रण लिया था कि यदि पुतला जल जाएगा तो वे नवरात्रि में वहां मेला शुरू करेंगे और रावण दहन कराएंगे। तभी से यह परंपरा कायम है।
कमलनाथ महादेव मंदिर : जहां शिव से पहले होती है रावण की पूजा
उदयपुर जिले में झाड़ोल तहसील की आवरगढ़ पहाड़ियों में समुद्र तल से ऊँचाई पर स्थित कमलनाथ महादेव मंदिर राजस्थान का एक अनोखा तीर्थ है। यह मंदिर उदयपुर से लगभग 80 किमी दूर है और इसकी विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव की पूजा से पहले रावण की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि यदि पहले रावण की पूजा न की जाए तो शिव की पूजा निष्फल मानी जाती है। मंदिर परिसर में एक ओर रावण की प्रतिमा और दूसरी ओर शिवलिंग स्थापित है।
पौराणिक कथा के अनुसार रावण प्रतिदिन शिव को 108 कमल अर्पित करता था। एक बार एक कमल कम पड़ने पर उसने अपना सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिया। इससे प्रसन्न होकर शिव ने उसे दस सिर और उसकी नाभि में अमृत कुंड का वरदान दिया। कमलनाथ महादेव मंदिर में सावन और महाशिवरात्रि पर मेला लगता है। भक्तों की मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु भगवान शिव को चूरमे का भोग अर्पित करते हैं। मंदिर के नीचे शनि देव का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। यह स्थल आज भी रावण की भक्ति और शिव की महिमा की अनोखी गाथा को जीवंत करता है।