उदयपुर, 14 सितंबर (सुभाष शर्मा): ‘झीलों की नगरी’ के नाम से मशहूर उदयपुर केवल सौंदर्य और पर्यटन का केंद्र नहीं है, बल्कि यह जल प्रबंधन की अद्वितीय कला का जीवंत उदाहरण भी है। यहाँ सदियों पहले जो लिंक तंत्र (Interlinked Lake System) बनाया गया, वह आज की आधुनिक इंटीग्रेटेड वॉटर मैनेजमेंट योजनाओं को भी मात देता है।
महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने 1559 में जब इस शहर की नींव रखी, तब पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौती थी। पहाड़ियों से घिरे इस क्षेत्र में राजाओं ने झीलों का निर्माण प्राथमिकता से कराया। पिछोला झील से शुरुआत हुई और धीरे-धीरे फतेहसागर, स्वरूप सागर, दूध तलाई, गोवर्धन सागर जैसी झीलें बनीं।
लिंक तंत्र की अद्भुत सोच
इन झीलों की खासियत सिर्फ निर्माण नहीं, बल्कि उनकी कनेक्टिविटी रही। नहरों और चैनलों के ज़रिए एक झील का अतिरिक्त पानी दूसरी झील तक पहुँचता रहा। इस व्यवस्था ने बाढ़ की समस्या को रोका और हर मौसम में जल संचयन सुनिश्चित किया।
आज जिन सिद्धांतों को ‘सस्टेनेबल वाटर मैनेजमेंट’ कहा जाता है, वही उदयपुर में 400 साल पहले बिना तकनीक के लागू हो चुके थे। राजपूत शासकों की यह दूरदर्शिता उनकी भौगोलिक समझ और विज्ञान पर पकड़ को दर्शाती है।
आधुनिक दुनिया के लिए सीख
जब दुनिया जल संकट, बाढ़ और भूजल गिरावट से जूझ रही है, उदयपुर का यह लिंक तंत्र बताता है कि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग और प्रकृति के साथ तालमेल ही स्थायी समाधान है। यही वजह है कि झीलों का यह विज्ञान केवल उदयपुर वासियों के लिए गर्व नहीं, बल्कि वैश्विक प्रेरणा है।