‘अति पर्यटन’ से उदयपुर की झीलों और विरासत पर खतरा: पर्यावरणविद

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नीमच माता रोपवे, रात्रिकालीन नौकायन और बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों पर जताई चिंता
उदयपुर, 10 मई :
उदयपुर के झील प्रेमियों और पर्यावरण चिंतकों ने “अति पर्यटन-केवल पर्यटन” आधारित विकास मॉडल को शहर की झीलों, जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक गरिमा के लिए गंभीर खतरा बताया है। रविवार को बारी घाट पर आयोजित संवाद में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि अनियंत्रित पर्यटन गतिविधियों से उदयपुर की पारिस्थितिकी और पहचान दोनों प्रभावित हो रही हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि नीमच माता मंदिर तक रात्रिकालीन रोपवे संचालन और झीलों में देर रात तक नौकायन जैसी गतिविधियां पर्यावरणीय दृष्टि से अनुचित हैं। कृत्रिम रोशनी और ध्वनि प्रदूषण से पक्षियों, वन्यजीवों और जलीय जीवों की जैविक घड़ी प्रभावित हो रही है।
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेजशंकर पालीवाल ने कहा कि धार्मिक स्थलों के आसपास बढ़ता व्यावसायीकरण उनकी पारंपरिक गरिमा को नुकसान पहुंचा रहा है। समाजविद नंदकिशोर शर्मा ने झीलों को अंतरराष्ट्रीय महत्व का वेटलैंड बताते हुए इनके संरक्षण पर जोर दिया। वक्ताओं ने मांग की कि झील क्षेत्रों में “नाइट इकोलॉजी प्रोटोकॉल” लागू किए जाएं और पर्यटन विकास में पर्यावरण, संस्कृति व स्थानीय समाज के हितों को प्राथमिकता दी जाए।