आदिवासी मुद्दे पर सांसद और बीएपी में तीखी बहस
उदयपुर, 13 जुलाई: समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मसौदे पर सुझाव लेने के लिए सोमवार को उदयपुर कलेक्ट्रेट में आयोजित संभागस्तरीय जनसुनवाई विवादों में घिर गई। जनसुनवाई में आम लोगों की अपेक्षा अफसरों और नेताओं की मौजूदगी अधिक रही। कांग्रेस ने इसे महज औपचारिकता बताते हुए बहिष्कार कर दिया, जबकि आदिवासी हितों और यूसीसी के दायरे को लेकर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत और बीएपी प्रतिनिधियों के बीच तीखी बहस भी हुई।
कांग्रेस ने कहा- बंद कमरे में जनसुनवाई का क्या मतलब?
कांग्रेस शहर जिला अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ समर्थकों के साथ जनसुनवाई में पहुंचे, लेकिन उन्होंने प्रारूप समिति सदस्य एवं अतिरिक्त महाधिवक्ता बसंतसिंह छाबड़ा से कहा कि बंद कमरे में आयोजित जनसुनवाई का कोई औचित्य नहीं है। उनका कहना था कि आमजन तक इसकी जानकारी ही नहीं पहुंची और न ही व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया। इसके बाद उन्होंने जनसुनवाई का बहिष्कार करते हुए सभागार छोड़ दिया। इस दौरान उनकी सांसद डॉ. मन्नालाल रावत से नोकझोंक भी हुई।
आदिवासी मुद्दे पर सांसद और बीएपी आमने-सामने
जनसुनवाई के दौरान भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा के प्रदेश संयोजक निशाकर सिंह डामोर ने आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और यूसीसी से आदिवासियों को बाहर रखने का सुझाव रखा। इस पर सांसद डॉ. रावत ने कहा कि बीएपी एक राजनीतिक दल है और वह पूरे आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती। दोनों पक्षों के बीच कुछ देर तक तीखी बहस होती रही।
आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखने की मांग
सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने उत्तराखंड और गोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची तथा आदिवासी समाज की परंपराओं को देखते हुए उन्हें यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने धर्मांतरण कर ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले लोगों पर यूसीसी लागू करने का सुझाव भी दिया।
प्रचार के अभाव में फीकी रही जनसुनवाई
जनसुनवाई में मुश्किल से 10 से 15 लोग ही सुझाव देने पहुंचे। इससे अधिक संख्या अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की रही। अतिरिक्त महाधिवक्ता बसंतसिंह छाबड़ा ने कहा कि जनसुनवाई का उद्देश्य सभी पक्षों के सुझाव लेना है और किसी को किसी के विचारों का प्रतिवाद करने के बजाय रचनात्मक सुझाव देने चाहिए।