विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता और वैश्विक प्रासंगिकता पर रखे विचार
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शिक्षा संकाय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा: एक संवाद’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार शुरू
उदयपुर, 16 अप्रैल: मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय में गुरुवार से “भारतीय ज्ञान परंपरा : एक संवाद” विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ गोल्डन जुबली गेस्ट हाउस में दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम में देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने भाग लेते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर विचार रखे।
सेमिनार के बीज वक्ता प्रो. गोपीनाथ शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण का मजबूत आधार है। उन्होंने वेदों, गीता, साहित्य और प्राचीन विज्ञान का उल्लेख करते हुए कहा कि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक की जो बातें हो रही हैं, उनकी जड़ें भारतीय ज्ञान में पहले से मौजूद हैं।
विशिष्ट अतिथि प्रो. मीरा माथुर ने श्रीमद्भगवद्गीता को नेतृत्व और प्रबंधन का सर्वोत्तम ग्रंथ बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा जीवन मूल्यों और कर्मयोग की शिक्षा देती है। वहीं प्रो. मदन सिंह राठौड़ और प्रो. एम.पी. शर्मा ने भारतीय दर्शन और गीता के मनोवैज्ञानिक पक्षों पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि प्रो. सी.एस. चौहान ने कहा कि भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें कर्म, संस्कार और परोपकार सर्वोपरि हैं। कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक बताते हुए कहा कि शिक्षकों की भूमिका चरित्र निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सपना मावतवाल और डॉ. स्वाति लोढ़ा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कुमुद पुरोहित ने दिया। सेमिनार के तकनीकी सत्रों में विभिन्न उपविषयों पर विशेषज्ञों ने शोध प्रस्तुतियां दीं। आयोजन में विश्वविद्यालय के डीन, प्राचार्य, शोधार्थी और बड़ी संख्या में शिक्षाविद उपस्थित रहे।
