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महाराणा प्रताप : युद्धवीर ही नहीं, पुनर्निर्माता भी

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महाराणा प्रताप : युद्धवीर ही नहीं, पुनर्निर्माता भी

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प्रो. महेश शर्मा
महाराणा प्रताप को प्रायः केवल एक युद्धवीर के रूप में स्मरण किया जाता है, जबकि उनका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक था। उनके 25 वर्षीय शासनकाल (1572–1597) का लगभग आधा समय संघर्ष में और आधा समय मेवाड़ के पुनर्निर्माण में बीता।
1572 से 1585 तक उन्होंने मुगल दबाव, हल्दीघाटी के युद्ध और अरावली के संघर्षों के बीच स्वतंत्रता की रक्षा की। इसके बाद 1585 से 1597 तक चावंड को राजधानी बनाकर कृषि, व्यापार, प्रशासन और जनजीवन के पुनर्गठन का कार्य किया। यद्यपि मुगलों से कोई औपचारिक संधि नहीं हुई थी, फिर भी यह काल पुनर्निर्माण और सुदृढ़ीकरण का युग था। प्रताप के शासन में विद्वान चक्रपाणि मिश्र ने विश्ववल्लभ, मुहूर्तमाला, राज्याभिषेक पद्धति और व्यवहारादर्श जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों में कृषि, पर्यावरण, जल-संरक्षण, ज्योतिष, न्याय और राज्य-प्रशासन का विस्तृत विवेचन मिलता है। इससे स्पष्ट है कि प्रताप केवल युद्ध नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और लोककल्याण के भी संरक्षक थे।
इसी कारण प्रताप के दो ऐतिहासिक रूप स्वीकार्य हैं। कवच और शस्त्रों से सुसज्जित प्रताप उनके संघर्षकाल का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि राजसी, शांत और प्रजावत्सल स्वरूप उनके पुनर्निर्माण काल का। राजा रवि वर्मा ने उन्हें राष्ट्रीय चेतना के वीर प्रतीक के रूप में चित्रित किया, जबकि नाथद्वारा के चित्रकार कुंदनलाल ने उनके शांत, लोकनायक और राजधर्मनिष्ठ स्वरूप को उकेरा। प्रताप की सबसे संतुलित छवि वही है जिसमें योद्धा और राष्ट्रनिर्माता—दोनों साथ दिखाई दें। उनके हाथ में तलवार अवश्य थी, पर उसका उद्देश्य विजय नहीं, स्वतंत्रता की रक्षा था। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि संघर्ष के बाद मेवाड़ को पुनः खड़ा करना और प्रजा के लिए समृद्ध भविष्य का निर्माण करना था।

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