आदिवासी अंचलों में प्रचलित हैं बारिश बुलाने की लोक परंपराएं
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आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम
उदयपुर, 30 जून: बरसात में देरी होते ही उदयपुर संभाग के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में वर्षा की कामना के लिए सदियों पुरानी लोक परंपराएं फिर जीवंत हो उठती हैं। विज्ञान और आधुनिक मौसम पूर्वानुमान के दौर में भी मेवाड़–वागड़ अंचल के कई गांवों में लोग आज भी इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए अनूठे धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान करते हैं।
सबसे चर्चित परंपरा मेंढ़क-मेंढ़की का विवाह है। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के कई गांवों में पूरे रीति-रिवाज, बैंड-बाजे और सात फेरों के साथ यह विवाह कराया जाता है। मान्यता है कि मेंढ़कों की टर्र-टर्र से इंद्रदेव प्रसन्न होकर अच्छी वर्षा करते हैं। विवाह के बाद दोनों मेंढ़कों को तालाब या नदी में छोड़ दिया जाता है। इसके अलावा कई गांवों में इंद्रदेव का यज्ञ, रुद्राभिषेक, अखंड रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और कलश यात्राएं आयोजित की जाती हैं। महिलाएं सिर पर कलश रखकर गांव की परिक्रमा करती हैं और अच्छी वर्षा की प्रार्थना करती हैं।
आदिवासी क्षेत्रों में बच्चे और महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए घर-घर जाते हैं तथा अनाज एकत्र कर सामूहिक पूजा करते हैं। कई स्थानों पर खेतों और जलस्रोतों के पास विशेष पूजा कर प्रकृति संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है। वागड़ के ख्यातनाम ज्योतिषी पं. प्रदीप द्विवेदी बताते हैं ये परंपराएं केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि समाज को एकजुट करने और प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम भी हैं। सामूहिक आयोजन लोगों में सहयोग, जल संरक्षण और खेती के प्रति सकारात्मक भावना विकसित करते हैं।
