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2008 नहीं, 1928 में हुआ था राजस्थान का पहला टाइगर रिलोकेशन? मेवाड़ के महारावल ने ग्वालियर से मंगवाया था बाघों का जोड़ा

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2008 नहीं, 1928 में हुआ था राजस्थान का पहला टाइगर रिलोकेशन? मेवाड़ के महारावल ने ग्वालियर से मंगवाया था बाघों का जोड़ा

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उदयपुर, 31 जुलाई: राजस्थान में टाइगर रिलोकेशन की बात आते ही अधिकांश लोग वर्ष 2008 को याद करते हैं, जब रणथंभौर से सरिस्का तक हेलीकॉप्टर के जरिए बाघ पहुंचाकर दुनिया का पहला सफल “टाइगर री-इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट” शुरू किया गया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेवाड़ की धरती पर लगभग 80 वर्ष पहले ही टाइगर रिलोकेशन का एक अनूठा प्रयोग हो चुका था?
वन्यजीव इतिहास के शोधकर्ता प्रो. महेश शर्मा का दावा है कि वर्ष 1928 में डूंगरपुर रियासत के महारावल लक्ष्मण सिंह ने ग्वालियर से बाघों का एक जोड़ा मंगवाकर अपने जंगलों में बसाया था। यदि यह ऐतिहासिक तथ्य आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो यह राजस्थान ही नहीं, देश के शुरुआती टाइगर रिलोकेशन प्रयासों में शामिल माना जा सकता है।
जब अंग्रेजों ने खत्म कर दिए थे मेवाड़ के बाघ
प्रो. शर्मा बताते हैं कि महारावल लक्ष्मण सिंह जब मेयो कॉलेज में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, उस दौरान डूंगरपुर रियासत का प्रशासन ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट के हाथों में था। शिकार के शौकीन अंग्रेज अधिकारियों के कारण रियासत के अधिकांश बाघ मारे गए। गद्दी संभालने के बाद महारावल ने दिल्ली स्थित ब्रिटिश शासन से शिकायत करते हुए जंगलों में फिर से बाघ बसाने की मांग की।
रेल, बैलगाड़ी और ट्रक से आया था बाघों का जोड़ा
उस दौर में न ट्रैंक्विलाइज़र गन थीं और न ही आधुनिक वन्यजीव परिवहन की व्यवस्था। ऐसे में अंग्रेजों ने एक वन्यजीव आपूर्तिकर्ता की मदद से ग्वालियर से बाघों का एक जोड़ा पकड़वाया। उन्हें पिंजरों में रेल के जरिए गुजरात के तलोद स्टेशन तक लाया गया। वहां से बैलगाड़ी और ट्रक के माध्यम से डूंगरपुर पहुंचाकर जंगल में छोड़ा गया।
25 बाघों तक पहुंचा कुनबा
बताया जाता है कि इस जोड़े से बढ़कर आजादी के समय तक डूंगरपुर अंचल में करीब 25 बाघों का कुनबा हो गया था। हालांकि स्वतंत्रता के बाद शिकार और बदलती परिस्थितियों के कारण पूरे मेवाड़ से बाघों का अस्तित्व समाप्त हो गया।
‘बोखा’ आज भी सुनाता है संरक्षण की कहानी
प्रो. शर्मा के अनुसार, उम्र बढ़ने और दांत टूट जाने से एक बाघ शिकार करने में असमर्थ हो गया था। उसके मानवभक्षी बनने की आशंका पर महारावल ने स्वयं उसे गोली मारकर पीड़ा से मुक्ति दी। बाद में उसकी याद में उसे स्टफ (टैक्सिडर्मी) कर महल में संरक्षित रखा गया, जिसे स्थानीय लोग “बोखा” के नाम से जानते हैं। यह आज भी डूंगरपुर के वन्यजीव इतिहास का एक अनूठा साक्ष्य माना जाता है।
फैक्ट बॉक्स | मेवाड़ के टाइगर रिलोकेशन की कहानी
वर्ष: 1928 (दावा)
स्थान: ग्वालियर से डूंगरपुर
पहल: महारावल लक्ष्मण सिंह
उद्देश्य: विलुप्त हो चुके बाघों को फिर से बसाना
परिवहन: रेल, बैलगाड़ी और ट्रक
विशेष: आजादी तक बाघों की संख्या लगभग 25 होने का दावा
प्रतीक: महारावल के महल में संरक्षित “बोखा”

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