‘गो’ का अर्थ इंद्रियां और ‘वर्धन’ का अर्थ बढ़ना, यही गोवर्धन लीला : पुष्कर दास महाराज
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भागवत कथा के पांचवें दिन गिरिराज धरण को सामूहिक 56 भोग, भक्ति गीतों और जयकारों से गूंजा कथा पंडाल
उदयपुर, 18 सितंबर: बड़गांव के सुथार समाज भवन में श्री पुष्कर दास महाराज के सान्निध्य में चल रहे संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा अमृत महोत्सव के पांचवें दिन भगवान श्रीकृष्ण की बाल एवं दिव्य लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। कथा पंडाल भगवान श्रीकृष्ण और गिरिराज धरण के जयकारों से गूंज उठा।
महाराज ने यशोदा मैया और बाल कृष्ण के वात्सल्य प्रेम का वर्णन करते हुए कहा कि ईश्वर के समक्ष सांसारिक वैभव और अहंकार का कोई महत्व नहीं है। सच्ची भक्ति और निर्मल श्रद्धा से ही प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने पूतना वध, शकटासुर वध और माखन चोरी की लीलाओं का आध्यात्मिक अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान ने केवल दूध का माखन नहीं चुराया, बल्कि गोपियों के निष्कलंक मन रूपी माखन को अपनाया। मटकी फोड़ने की लीला अहंकार के विनाश का प्रतीक है।
चीरहरण लीला की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ वस्त्रहरण नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे वासना और विकारों के आवरण को दूर करना है। गोवर्धन लीला पर उन्होंने कहा कि ‘गो’ का अर्थ इंद्रियां और ‘वर्धन’ का अर्थ बढ़ना है। श्रद्धा, भक्ति और इंद्रिय संयम का बढ़ना ही वास्तविक गोवर्धन लीला है।
कथा के अंत में बड़गांव के श्रद्धालुओं ने भगवान गिरिराज धरण को सामूहिक 56 भोग अर्पित किया। महिलाओं ने भक्ति भाव से नृत्य किया और गिरिराज धरण के जयकारे लगाए।

