रोटी पांच की हुई, जनता तीन पर खुश हो गई… उदयपुर में पानी की कहानी भी कुछ ऐसी ही
Share
सुभाष शर्मा
एक कहानी है। एक व्यापारी रोटी बेचता था। रोटी की कीमत एक रुपया थी। व्यापारी चाहता था कि रोटी के दो रुपये मिलें। उसने राजा से सलाह ली—‘‘यदि एक से सीधे दो रुपये कर दूं तो जनता विरोध करेगी, आंदोलन करेगी, शिकायत लेकर आपके पास आएगी।’’
राजा ने कहा—‘‘एक काम करो, रोटी की कीमत सीधे दो रुपये मत करो। पांच रुपये कर दो।’’
व्यापारी ने ऐसा ही किया। रोटी पांच रुपये की हुई तो जनता में हाहाकार मच गया। महंगाई के खिलाफ आवाजें उठीं, विरोध हुआ, आंदोलन की स्थिति बनी। राजा ने बैठक बुलाई, जनता को आश्वासन दिया कि रोटी की कीमत कम की जाएगी। कुछ समय बाद रोटी पांच से घटाकर तीन रुपये कर दी गई।
जनता खुश हो गई। राजा के जयकारे लगने लगे।
व्यापारी का काम भी हो गया और राजा की लोकप्रियता भी बच गई। जिस रोटी की कीमत एक रुपये थी, वह अब तीन रुपये में बिक रही थी और जनता इसे राहत मानकर खुश थी।
कहानी पुरानी है, लेकिन इसका मर्म आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उदयपुर की पेयजल व्यवस्था को देखें तो यह कहानी एक अलग रूप में सामने आती दिखाई देती है।
नगर निकाय चुनावों के दौरान उदयपुर की जनता से पेयजल आपूर्ति को लेकर उम्मीदें जगाई गई थीं। हर दूसरे दिन होने वाली पानी की सप्लाई को प्रतिदिन करने का वादा सामने आया। यानी जनता जिस व्यवस्था की अपेक्षा कर रही थी, वह थी—हर दिन पानी।
उदयपुर जैसे शहर के लिए यह कोई विलासिता नहीं, मूलभूत आवश्यकता है।
इससे पहले चौबीस घंटे पेयजल आपूर्ति की महत्वाकांक्षी योजना भी सामने आ चुकी है। करीब 600 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत लगभग 250 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाकर शहर में 24 घंटे पानी पहुंचाने की परिकल्पना की गई थी। योजना का सपना बड़ा था, लेकिन उसकी प्रगति और वास्तविकता पर सवाल अपनी जगह बने हुए हैं।
अब वर्तमान स्थिति पर आइए।
जहां जनता को प्रतिदिन पानी मिलने की उम्मीद दिखाई गई थी, वहां पेयजल संकट का हवाला देते हुए आपूर्ति का अंतर बढ़ाकर 72 घंटे करने की बात सामने आई। यानी जो व्यवस्था 48 घंटे में एक बार पानी दे रही थी, उससे भी पीछे जाने की स्थिति बन गई।
यहीं से रोटी वाली कहानी याद आती है।
तीन दिन में पानी मिलने की स्थिति बनी तो स्वाभाविक रूप से जनता में बेचैनी पैदा हुई। सवाल उठे। इसके बाद शहर विधायक ताराचंद जैन ने प्रशासन और संबंधित विभाग के साथ बैठकें कीं और 72 घंटे के अंतराल के बजाय पूर्व की तरह 48 घंटे में पेयजल आपूर्ति बहाल करने पर जोर दिया।
और अंततः बात 48 घंटे पर आकर टिक गई।
अब सवाल यह नहीं है कि 72 घंटे की तुलना में 48 घंटे बेहतर हैं या नहीं। निश्चित रूप से दो दिन में एक बार पानी मिलना तीन दिन में एक बार पानी मिलने से बेहतर है। असली सवाल इससे बड़ा है—
जब जनता से हर दिन पानी देने का वादा किया गया था, तो क्या 48 घंटे में पानी मिल जाना उपलब्धि का पैमाना बन जाना चाहिए?
क्या शहर की अपेक्षाएं इतनी नीचे कर दी जाएं कि तीन दिन की जगह दो दिन में पानी मिल जाए और इसे राहत माना जाए?
यही वह बिंदु है जहां रोटी वाली कहानी का व्यंग्य उदयपुर की पेयजल व्यवस्था पर चुभता है।
पहले जनता को प्रतिदिन पानी मिलने की उम्मीद दिखाई गई। फिर पानी की कमी के कारण 72 घंटे का अंतर सामने आया। इसके बाद प्रयास हुए और व्यवस्था 48 घंटे पर लौट आई। परिणाम यह हुआ कि जिस व्यवस्था में जनता को प्रतिदिन पानी मिलना था, वहां दो दिन में एक बार पानी मिलने पर भी अपेक्षाकृत संतोष का वातावरण बन गया।
मानक बदल गया। अपेक्षा बदल गई। और शायद इसी के साथ सवाल पूछने का तेवर भी बदल गया।
पानी केवल किसी सरकार, किसी विभाग या किसी जनप्रतिनिधि का वादा नहीं है। पानी नागरिक का मूल अधिकार और जीवन की अनिवार्य जरूरत है। इसलिए पेयजल की बहस को केवल यह कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता कि ‘‘पहले 72 घंटे होने जा रहे थे, अब 48 घंटे में पानी मिल रहा है।’’
जनता को यह जानने का अधिकार है कि शहर में पानी की वास्तविक उपलब्धता कितनी है? जल स्रोतों की स्थिति क्या है? पाइपलाइन और वितरण व्यवस्था में कितनी क्षमता है? भविष्य की आबादी के लिए क्या तैयारी है? और सबसे महत्वपूर्ण—जिस प्रतिदिन की आपूर्ति का वादा किया गया था, वह कब और किस ठोस योजना के आधार पर पूरी होगी?
उदयपुर पर्यटन की नगरी है। झीलों की नगरी है। लेकिन शहर की पहचान केवल झीलों, महलों और पर्यटन से नहीं हो सकती। शहर की असली कसौटी यह भी है कि यहां रहने वाले नागरिकों को उनके घर तक बुनियादी सुविधाएं कितनी नियमितता और सम्मान के साथ मिलती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पेयजल को चुनावी वादे और तत्काल राजनीतिक प्रबंधन के दायरे से निकालकर दीर्घकालीन शहरी योजना का विषय बनाया जाए।
क्योंकि जनता को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि—
‘‘तीन दिन में पानी नहीं मिलेगा, दो दिन में मिल जाएगा, इसलिए खुश हो जाइए।’’
जनता का सवाल इससे कहीं सीधा है—
‘‘जब वादा हर दिन पानी का था, तो हर दिन पानी कब मिलेगा?’’
रोटी की कीमत एक से तीन होने पर जनता खुश हो सकती है, क्योंकि उसे पता नहीं चलता कि खेल कैसे खेला गया। लेकिन पानी के मामले में हर घर को अपनी बाल्टी, अपना नल और अपनी प्यास से हिसाब करना पड़ता है।
और प्यास के सामने कोई कहानी ज्यादा दिन नहीं चलती।

