राणा हम्मीर की चित्तौड़ विजय थी सांस्कृतिक पुनरुत्थान का ऐतिहासिक पड़ाव : मेतवाला
Share
चित्तौड़ विजय के 700 वर्ष पर प्रताप गौरव केंद्र में परिचर्चा, वक्ताओं ने राणा हम्मीर के शौर्य और स्वाधीनता संघर्ष को किया याद
उदयपुर, 31 अक्टूबर: राणा हम्मीर सिंह की चित्तौड़ विजय केवल दुर्ग पर अधिकार नहीं, बल्कि मेवाड़ की स्वाधीनता और हिंदू रियासतों के पुनरुत्थान का ऐतिहासिक अध्याय थी। उनके पराक्रम ने देश में नई राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना जगाई। यह विचार शनिवार को प्रताप गौरव केंद्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ में मेदपाट विचार मंच की ओर से आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने व्यक्त किए।
मुख्य वक्ता मेवाड़ क्षत्रिय महासभा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष अशोक सिंह मेतवाला ने कहा कि राणा हम्मीर ने मेवाड़ को विदेशी सत्ता से मुक्त कर एकलिंगनाथ के चरणों में पुनः समर्पित किया। उनके विजय अभियान ने देश में स्वाधीनता की नई चेतना जगाई। इसी परंपरा ने आगे महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे महान योद्धाओं के लिए प्रेरणाभूमि तैयार की।
अध्यक्षता करते हुए वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद भी मेवाड़ का संघर्ष जारी रहा। सिसोदा में जन्मे राणा हम्मीर ने 1326 में चित्तौड़ को मुक्त कराकर मेवाड़ की स्वाधीन सत्ता स्थापित की। उन्होंने सिंगोली के युद्ध में मोहम्मद बिन तुगलक को पराजित कर बंदी बनाने का प्रसंग भी बताया।
मंच के निदेशक अनुराग सक्सेना ने कहा कि नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने और वैचारिक स्पष्टता विकसित करने के उद्देश्य से मंच पर ऐतिहासिक एवं समसामयिक विषयों पर संवाद होगा।
परिचर्चा में प्रो. शिल्पा मेहता, प्रो. उमाशंकर शर्मा, प्रो. सीमा मल्लिक, अधिवक्ता रमन सूद, डॉ. विवेक भटनागर, डॉ. कपिल देव आमेटा और डॉ. मनीष श्रीमाली सहित कई प्रबुद्धजनों ने विचार रखे। संयोजक डॉ. सुभाष भार्गव ने आभार जताया।

