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सौभागपुरा चौराहे के नामकरण विवाद में श्रीगुरुजी का नाम घसीटना दुर्भाग्यपूर्ण : डॉ. विप्लवी

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सौभागपुरा चौराहे के नामकरण विवाद में श्रीगुरुजी का नाम घसीटना दुर्भाग्यपूर्ण : डॉ. विप्लवी

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उदयपुर, 31 अक्टूबर: सौभागपुरा चौराहे के नामकरण को लेकर चल रहे विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरुजी) का नाम जोड़े जाने पर पूर्व पार्षद डॉ. विजय विप्लवी ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि श्रीगुरुजी का नाम इस विवाद में घसीटना उनके विचारों, सिद्धांतों और जीवन-दर्शन के विपरीत है। चौराहे का नामकरण पहले ही मेवाड़ के ऐतिहासिक व्यक्तित्व ठाकुर अमरचंद बड़वा के नाम पर करने का निर्णय हो चुका है।
डॉ. विप्लवी ने अपने वक्तव्य में कहा कि श्रीगुरुजी प्रसिद्धि और व्यक्तिगत सम्मान से दूर रहने वाले आध्यात्मिक व्यक्तित्व थे। वे स्वयं कहते थे कि उनके स्मारक नहीं बनाए जाने चाहिए। उन्होंने इसके समर्थन में डॉ. चन्द्रिकाप्रसाद वाजपेयी की पुस्तक में प्रकाशित अटल बिहारी वाजपेयी के संस्मरण का उल्लेख किया।
उन्होंने वर्ष 1965 के उदयपुर के एक प्रसंग का जिक्र करते हुए बताया कि तत्कालीन नगर निगम सभापति मदनलाल धुप्पड़ और उपसभापति भानुकुमार शास्त्री ने श्रीगुरुजी के नागरिक अभिनंदन का प्रस्ताव रखा था। इस पर श्रीगुरुजी ने स्पष्ट किया था कि यदि नगर निगम का बोर्ड सर्वसम्मति से आयोजन का निर्णय करता है, तभी वे इसमें शामिल होंगे। बाद में कांग्रेस पार्षद मोहम्मद हुसैन हैदरी ने अभिनंदन प्रस्ताव रखा, जो सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसके बाद 1 जून 1965 को सहेलियों की बाड़ी में उनका नागरिक अभिनंदन किया गया।
2018 में अमरचंद बड़वा के नाम पर हो चुका है निर्णय
डॉ. विप्लवी ने बताया कि 5 जून 2018 को नगर विकास प्रन्यास की तत्कालीन अध्यक्ष रवीन्द्र श्रीमाली की अध्यक्षता में हुई बोर्ड बैठक में सौभागपुरा चौराहे का नामकरण ठाकुर अमरचंद बड़वा के नाम पर करने का निर्णय लिया गया था। बड़वा मेवाड़ के महाराणा काल में 1751 से 1778 तक प्रधानमंत्री रहे और चार महाराणाओं के साथ इस दायित्व का निर्वहन किया। उनके कार्यकाल में शहरकोट और अमरकुंड जैसे महत्वपूर्ण निर्माण हुए। उन्होंने कहा कि जब सक्षम प्राधिकरण की बैठक में नामकरण का निर्णय पहले ही हो चुका है, तो व्यक्तिगत आग्रह या प्रतिष्ठा के लिए श्रीगुरुजी के नाम को विवाद में लाना उचित नहीं है। सभी पक्षों को इतिहास, पूर्व निर्णय और श्रीगुरुजी के विचारों का सम्मान करते हुए इस विषय को देखना चाहिए।

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