आदिवासियों के लिए “करो या मरो” की स्थिति: वृंदा करात
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उदयपुर, 27 जून: पूर्व सांसद एवं आदिवासी राष्ट्रीय अधिकार मंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वृंदा करात ने कहा कि जंगल बचाने के नाम पर सरकार की नजर जंगलों में बसे आदिवासियों पर है, जबकि जंगल की वास्तविक पहचान आदिवासियों से ही है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों को अपने जीवन, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए “करो या मरो” के जज्बे के साथ मजबूत आंदोलन खड़ा करना होगा। माछला मंगरा स्थित शिराली भवन में वनाधिकार पट्टों की मांग को लेकर आयोजित युवा प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद राजस्थान में एक भी नया वनाधिकार पट्टा जारी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि राज्य में 1.18 लाख से अधिक आवेदनों में से 66 हजार से ज्यादा निरस्त कर दिए गए, जबकि उदयपुर जिले में 22,533 में से 9,775 आवेदन अस्वीकृत हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि कानून में 25 बीघा तक भूमि का अधिकार होने के बावजूद आदिवासियों को केवल दो से चार बीघा भूमि ही दी गई। आदिवासी जनाधिकार एका मंच के प्रदेश अध्यक्ष दुलीचंद मीणा ने भी वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और आदिवासियों के लिए अलग जनगणना कॉलम की मांग उठाई। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वनाधिकार के मुद्दे का समाधान नहीं हुआ तो उदयपुर में व्यापक जन आंदोलन किया जाएगा।
