विश्व विरासत दिवस पर संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने धरोहर बचाने के लिए जनभागीदारी पर दिया जोर
उदयपुर, 18 अप्रैल: विश्व विरासत दिवस पर भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण विभाग, साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा शोध केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में विरासत संरक्षण के लिए जनजागरूकता और स्थानीय भागीदारी को सबसे अहम उपाय बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि आमजन अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के महत्व को समझें और उनके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाएं, तो नष्ट होती विरासतों को बचाया जा सकता है।
जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के कुल प्रमुख बी.एल. गुर्जर ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि विरासतों को युद्ध और आपदाओं से बचाने की चर्चा से पहले उन्हें स्वार्थी तत्वों से सुरक्षित रखना जरूरी है। उन्होंने शोधार्थियों से बुजुर्गों के अनुभवों और लोककथाओं को संकलित करने का आह्वान करते हुए कहा कि हमारी मौखिक परंपराओं में ही इतिहास छिपा है।
‘संघर्ष और आपदाओं में धरोहर संरक्षण’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञ डॉ. बृजेन्द्र सिंह गहलोत ने कहा कि विरासतों के संरक्षण का एकमात्र प्रभावी रास्ता जागरूकता है। उन्होंने चेताया कि जो धरोहरें कुछ वर्ष पहले विश्व विरासत घोषित हुई थीं, वे आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं।
ऑनलाइन संबोधन में भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के महानिदेशक डॉ. बी.वी. शर्मा ने धरोहर संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं साहित्य संस्थान के निदेशक डॉ. जीवन सिंह खरकवाल ने भारतीय परंपराओं में निहित वैज्ञानिक ज्ञान को हमारी अमूल्य विरासत बताते हुए कहा कि आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा गंभीर चिंता का विषय है।
कार्यक्रम में डॉ. राजेंद्र नाथ पुरोहित, डॉ. हंसमुख सेठ और डॉ. दीपक सालवी ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन एवं स्वागत डॉ. निलांजन खटुआ ने किया, जबकि आभार डॉ. कुलशेखर व्यास ने जताया।