मेवाड़-वागड़ में ‘राष्ट्रीय बांस मिशन’ बनेगा कम लागत में ज्यादा मुनाफे का जरिया
गोपाल लोहार
उदयपुर, 9 अप्रैल: मेवाड़-वागड़ क्षेत्र के किसान अब बांस की खेती से अच्छी कमाई की उम्मीद कर रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय बांस मिशन’ को पुनः सक्रिय किए जाने से उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, राजसमंद, सिरोही और सलूम्बर जिलों में बांस उत्पादन को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे किसानों के लिए आय के नए रास्ते खुल रहे हैं।
कम लागत, लंबे समय तक आय
कृषि विशेषज्ञ विजय कुमार शर्मा बताते हैं कि बांस की खेती में शुरुआती लागत अपेक्षाकृत कम होती है। एक हेक्टेयर में बांस लगाने पर लगभग 40 हजार से 1 लाख रुपए तक खर्च आता है (प्रजाति और तकनीक पर निर्भर)। रोपण के 4-5 साल बाद उत्पादन शुरू हो जाता है और एक बार स्थापित होने पर 20-25 साल तक लगातार पैदावार मिलती रहती है।
कितनी हो सकती है कमाई
एक हेक्टेयर में औसतन 800 से 1000 बांस के पौधे लगाए जा सकते हैं। परिपक्व होने के बाद एक पौधे से हर साल 8-10 बांस (डंठल) प्राप्त हो सकते हैं।
कुल उत्पादन: लगभग 8,000 से 10,000 बांस प्रति वर्ष
प्रति बांस कीमत: 50 से 150 रुपए (गुणवत्ता व बाजार पर निर्भर)
इस आधार पर किसान को सालाना लगभग 4 लाख से 10 लाख रुपए तक की आय संभव हो सकती है। इसमें से खर्च निकालने के बाद भी अच्छा मुनाफा बचता है।
प्रसंस्करण से बढ़ेगी कमाई
अगर किसान केवल कच्चा बांस बेचने के बजाय फर्नीचर, अगरबत्ती स्टिक, हैंडीक्राफ्ट या अन्य उत्पादों में उपयोग करते हैं, तो उनकी आय 20-30% तक और बढ़ सकती है। सरकार द्वारा कॉमन फैसिलिटी सेंटर और प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से इसमें और मदद मिलेगी। मिशन के तहत किसानों को नर्सरी, रोपण, कटाई और विपणन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही बाजार से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल
बांस की खेती पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ मृदा संरक्षण और जलवायु संतुलन में भी सहायक है। इसके विस्तार से मेवाड़-वागड़ के आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। इस तरह बांस की खेती मेवाड़-वागड़ के किसानों के लिए आने वाले वर्षों में स्थायी और लाभकारी आय का मजबूत विकल्प बनकर उभरेगी।