सलूंबर में रहस्यमयी बीमारी से 8 बच्चों की मौत, समय पर इलाज न मिलने और अंधविश्वास बना बड़ा कारण
उदयपुर, 9 अप्रैल : सलूंबर जिले के आदिवासी अंचल में रहस्यमयी बीमारी से 8 बच्चों की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलना, खराब सड़कें, नेटवर्क की कमी और सबसे बड़ी वजह—भोपों (झाड़-फूंक करने वालों) पर भरोसा—इन मासूमों की मौत का कारण बनता जा रहा है।
कई मामलों में परिजन बीमार बच्चों को अस्पताल ले जाने के बजाय पहले भोपों के पास ले गए। इसी देरी ने बच्चों की जान ले ली। घाटा गांव में 2 वर्षीय काजल को तेज ऐंठन और उल्टी की शिकायत थी, लेकिन परिजन उसे अस्पताल ले जाने के बजाय देवरे में भोपा के पास ले गए। भोपा ने ठीक होने का भरोसा दिलाया, लेकिन बच्ची की मौत हो गई।
अंधविश्वास के चलते बिगड़ती हालत
क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के साथ-साथ अशिक्षा भी बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। ग्रामीणों में आज भी बीमारी को लेकर वैज्ञानिक सोच के बजाय झाड़-फूंक पर भरोसा किया जाता है। कई मामलों में बच्चे रात को सामान्य हालत में सोए, लेकिन अचानक तबीयत बिगड़ने पर समय पर इलाज नहीं मिल सका।
लालपुरा गांव के मानूराम मीणा के दो बेटों की मौत इसका उदाहरण है। दोनों बच्चों की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन लगातार रेफर और देरी के कारण उनकी जान नहीं बच सकी।
खराब सड़क और नेटवर्क बना बाधा
लसाड़िया-धरियावाद क्षेत्र में सड़कें जर्जर हैं और मोबाइल नेटवर्क भी बेहद कमजोर है। एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती, जिससे मरीजों को अस्पताल ले जाने में घंटों लग जाते हैं। कई बार ड्राइवर खराब रास्तों के कारण आने से मना कर देते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार 35 किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है। ऐसे में ग्रामीण पहले झोलाछाप या भोपों का सहारा लेते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है।
पोस्टमॉर्टम नहीं, कारण अब भी रहस्य
चिंताजनक बात यह है कि किसी भी बच्चे का पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया। परिजनों की अनभिज्ञता और जागरूकता की कमी के चलते मौत के वास्तविक कारण का पता नहीं चल पा रहा है।
प्रशासन की सक्रियता, लेकिन चुनौती बरकरार
प्रशासन अब घर-घर सर्वे कर रहा है और बीमार बच्चों के सैंपल लेकर इलाज सुनिश्चित किया जा रहा है। हालांकि जब तक क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, सड़क सुधार और अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक ऐसे हादसों को रोकना मुश्किल होगा।