दिव्यांग पर 9 मासूमों का बोझ , माता-पिता मजदूरी के लिए गए गुजरात

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आधार कार्ड नहीं बने, सरकारी योजनाओं से वंचित परिवार, छोटे-छोटे बच्चे खुद बना रहे खाना; प्रशासनिक मदद का इंतजार
खेरवाड़ा, 29 जुलाई (फूलशंकर डामोर):
उदयपुर जिले के खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के काकरा डूंगरा तीन पट्टा गांव की एक मार्मिक कहानी सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। यहां 9 छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी एक ऐसे दिव्यांग युवक के कंधों पर है, जो स्वयं ठीक से चल-फिर और बोल नहीं सकता।
विकेश अहारी के माता-पिता रोजगार की तलाश में गुजरात चले गए हैं। घर में एक वर्ष से छह वर्ष तक के छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिनमें से किसी का भी स्कूल में दाखिला नहीं हुआ। परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ तो मिला, लेकिन नौ में से छह बच्चों का नाम अब तक राशन कार्ड में नहीं जुड़ पाया है। अधिकांश बच्चों के आधार कार्ड भी नहीं बने हैं, जिससे वे सरकारी योजनाओं से वंचित हैं।
मासूमों पर बचपन से पहले जिम्मेदारियों का बोझ
हालात ऐसे हैं कि छोटे बच्चे खुद खाना बनाते हैं और पड़ोसियों की मदद से खेती का काम भी संभालने का प्रयास करते हैं। परिवार का सबसे बड़ा भाई 16 वर्ष का है, लेकिन वह भी दिव्यांग होने के कारण पूरी जिम्मेदारी नहीं उठा पा रहा। घर में एक शिशु भी है, जिसकी देखभाल सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ग्राम विकास शिविर भी नहीं पहुंचे
ग्रामीण समय-समय पर मदद करते हैं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ग्राम विकास शिविरों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से इस परिवार तक पहुंचे तो बच्चों का भविष्य संवर सकता है। फिलहाल यह परिवार सरकारी सहायता और प्रशासन की संवेदनशील पहल का इंतजार कर रहा है।