मुद्दा: तस्करों ने खत्म कर दिए दशकों पुराने चंदन के पेड़
गोपाल लोहार
उदयपुर, 12 मई: कभी चंदन के सैकड़ों वृक्षों की खुशबू से महकने वाला उदयपुर का ऐतिहासिक गुलाब बाग आज अपनी पहचान खोने की कगार पर पहुंच गया है। स्थानीय लोगों में वर्षों तक “चंदनबाड़ी” के नाम से प्रसिद्ध रहे इस क्षेत्र में अब गिने-चुने चंदन के पेड़ ही शेष बचे हैं। चंदन तस्करी, कमजोर निगरानी और विभागीय लापरवाही के चलते दशकों पुरानी यह प्राकृतिक विरासत धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई।
स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों के अनुसार गुलाब बाग क्षेत्र में लंबे समय तक चंदन तस्कर सक्रिय रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चंदन की ऊंची कीमत के कारण रात के अंधेरे में पेड़ों को काटकर ले जाया जाता रहा। कई मामलों में तस्करों ने पेड़ों की जड़ों तक को उखाड़ दिया, जिससे दोबारा वृक्ष विकसित ही नहीं हो सके। लोगों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था कभी प्रभावी नहीं बन पाई।
गुलाब बाग का प्रबंधन पहले लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के पास था, जिसे बाद में नगर निगम को सौंप दिया गया। हालांकि जिम्मेदारी बदलने के बावजूद चंदन वृक्षों की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं बन सकी। विभागीय सूत्रों के अनुसार समय-समय पर वृक्ष गणना और सुरक्षा योजना की चर्चा हुई, लेकिन धरातल पर कार्रवाई कमजोर रही।
नगर निगम सूत्रों के अनुसार गुलाब बाग के रखरखाव और चौकीदार लगाने की जिम्मेदारी निगम देख रहा है, लेकिन कई स्थानों पर दीवारें टूटी हुई हैं। इस संबंध में कई बार संबंधित विभाग को पत्र लिखे गए, फिर भी अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। वहीं अधिकारियों का कहना है कि गुलाब बाग में चार चौकीदार तैनात हैं, लेकिन इसके बावजूद समाजकंटक अंदर घुस आते हैं। अधिकारियों ने यह भी माना कि गुलाब बाग पर मालिकाना हक पीडब्ल्यूडी का होने के कारण समन्वय की कमी बनी हुई है।
नगर निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना का कहना है कि अब बचे हुए चंदन वृक्षों का सर्वे, जियो-टैगिंग और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की योजना बनाई जा रही है। वहीं वन विभाग दक्षिणी राजस्थान में नए चंदन पौधों के रोपण की रणनीति तैयार कर रहा है। पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने मांग उठाई है कि गुलाब बाग की ऐतिहासिक “चंदनबाड़ी” को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए।