मेधावियों के सम्मान एवं कवियों की गूंज के साथ संपन्न हुआ ‘हिंदी सप्ताह-2026’,

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कुलपति प्रो. डागा ने बढ़ाया छात्रों का हौसला
उदयपुर, 22 सितम्बर:
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभाग एवं राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी सप्ताह-2026’ के अवसर पर संगोष्ठी एवं हिंदी सप्ताह समापन समारोह आयोजित हुआ।
इस अवसर पर “हिंदी भाषा : भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के संवाहक” विषय पर संगोष्ठी आयोजित हुई। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने कहा कि संस्कृत का सभी भारतीय भाषाओं के विकास में योगदान है। भाषा का संक्रमण होगा ही, अच्छी बातें स्वीकार होगी किंतु चिंता का विषय मौलिकता का खतरा है। विकसित राष्ट्रों की सफलता उनकी स्थानीय भाषाओं की मौलिकता पर टिकी है जो उन्हें आत्मविश्वास और समृद्धि देती है। उन्होंने आगे बताया कि हम विकसित राष्ट्र की और कदम बढ़ा चुके हैं ऐसे में हमारी भाषा और साहित्य और महत्वपूर्ण हो जाता है। हमें अपनी भाषा का सम्मान करना होगा। विश्व भाषाओं के सम्मान के साथ-साथ हमें अपनी भाषा की महत्ता स्वीकारनी होगी। भारतीय भाषाओं को सीखने की लगन जरूरी है। वाचिक परंपरा के द्वारा भाषा अगली पीढ़ी तक पहुंचती है।
मुख्य वक्ता प्रो. मलय पानेरी, अधिष्ठाता, श्रमजीवी महाविद्यालय ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषाएं परस्पर वैमनस्य नहीं रखती है केवल व्यक्ति रखते हैं। भाषा मनुष्य को मनुष्य बनाती है, आत्मसातीकरण हमारी संस्कृति की मुख्य प्रवृत्ति है। समय के साथ भाषा परिवर्तित होती जाती है, भाषा बहता नीर है। भाषा भी नदी की तरह अपना रास्ता स्वयं बनती है। परंपरा वह है जो अन्य प्रवृत्तियों को सम्मिलित करते हुए आगे बढ़ती है। क्षेत्रीय भाषा व बोलियों का सहयोग भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनता है। भाषा स्थानीयता के प्रभाव को ग्रहण करते हुए ही समृद्ध होती जाती है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की महत्ती भूमिका रही है। कवियों ने देश को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। भारतीय जनता को उसकी मूल चेतना से जोड़ा। आधुनिक समय भाषा संस्कार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों तक ही नहीं है वह लोक तक व्याप्त है, मौखिक परंपरा से पीढि़यों तक पहुंची है। हिंदी अपना नया संसार रच रही है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. के. बी. जोशी, अधिष्ठाता, स्नातकोत्तर अध्ययन, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर ने कहा कि विज्ञान की तरह भाषा व्याकरण में तार्किकता है। नवीन तकनीक ने भाषा का प्रसार किया। एफएम, रेडियो, दूरदर्शन चैनल, इंटरनेट से जुड़कर हिंदी नये आयामों तक पहुंची है। रेडियो जॉकी से संवाद कौशल सीखना चाहिए। हिंदी में स्क्रिप्ट राइटिंग और कंटेंट राइटिंग में बहुत संभावनाएं हैं।
हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नवीन नंदवाना ने स्वागत उद्बोधन एवं विषय प्रवर्तन करते हुए बताया कि हिंदी केवल संप्रेषण की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और सामूहिक स्मृतियों की संवाहक है। हिंदी ने लोकज्ञान, साहित्य, संत परंपरा और जीवन-मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत की भाषायी विविधता हमारी शक्ति है और हिंदी का दायित्व अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संवाद का सेतु बनना है। वर्तमान डिजिटल युग में हिंदी के सामने नई संभावनाएँ हैं। उन्होंने हिंदी को शिक्षा, शोध, विज्ञान, तकनीक और नवाचार की भाषा बनाने तथा युवाओं को इससे जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
एमए हिंदी के विद्यार्थियों ने नाटक के माध्यम से हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व, उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत तथा आपसी समन्वय को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। नाटक के माध्यम से भाषायी विविधता में एकता का संदेश दिया गया। विद्यार्थियों की सशक्त प्रस्तुति और संवाद शैली ने उपस्थितजनों को प्रभावित किया। कार्यक्रम में मौजूद अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने नुक्कड़ नाटक की सराहना करते हुए प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रियंका रावल और पूजा डीडल ने किया। इस समारोह में हिंदी सप्ताह में आयोजित प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम में धन्यवाद उद्बोधन डॉ. नीता त्रिवेदी ने दिया।
संगोष्ठी का विचार सत्र
इसके बाद संगोष्ठी का विचार सत्र आयोजित हुआ। विचार सत्र में “भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की संवाहक हिंदी भाषा” विषय पर मंथन हुआ। सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. श्री कृष्ण जुगनू ने भारतीय ज्ञान परंपरा में मेवाड़ के योगदान पर प्रकाश डाला। वीर विनोद की चर्चा करते हुए हिंदी के स्वरूप में लिपि के आयाम का उद्घाटन किया। हिंदी का कोश व्यापक है। हिंदी में रोजगार स्वरूप व टंकण के आयाम की चर्चा की। लिपियों के प्रकार व विकास की चर्चा की। ज्ञान परंपरा में भक्ति ज्ञान और वैराग्य पर प्रकाश डाला। लोक ज्ञान परंपरा की चर्चा करते हुए हिंदी के विविध स्तरों का उद्घाटन किया। उन्होंने आगे बताया कि जनश्रुतियों एवं लोक साहित्य में ज्ञान संचित है, भाषा ने लोक तत्वों को सहजा है। शिलालेखों के माध्यम से ज्ञान परंपरा की चर्चा की।
सत्र की वक्ता प्रो. प्रीति भट्ट ने संत भक्तों के भारतीय ज्ञान परंपरा में अवदान को रेखांकित करते हुए रामचरितमानस को ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ बताया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी का महत्व को रेखांकित किया एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी व सरस्वती पत्रिका की भूमिका का महत्व बताया।
डॉ. नीतू परिहार ने कहा कि जो समय के साथ चलता है वही आगे बढ़ता है। हिंदी भाषा अपने समय के साथ सदैव रही है, आधुनिक हिंदी कविता में राष्ट्रीयता का स्वर प्रमुखता से मिलता है। अटल जी की कविता ’स्वतंत्रता दिवस की पुकार’ व ‘अमर आग है’ के माध्यम से भारतीयता एवं भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला।
इस सत्र का मंच संचालन डॉ. वीरमाराम पटेल और कीर्तिका शर्मा ने किया। इस सत्र में दिलीप बेनीवाल और पुष्पा पूनिया ने प्रपत्र वाचन किया।
काव्य पाठ का आयोजन
संगोष्ठी में काव्य पाठ का आयोजन भी हुआ जिसमें आशा पाण्डेय ओझा, सुनीता निमिष सिंह, सुभाष अग्रवाल, डॉ निर्मला शर्मा, डॉ सरस्वती जोशी, दीपिका स्वर्णकार, अर्चना चावला, स्वाति शकुंत, विजय मारु, कुसुम भारद्वाज और डॉ. वीरमाराम पटेल ने कविताओं का पाठ किया। कवियों ने राष्ट्रीय एकता एवं भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर सरस कविताएं पढ़ी।
डॉ. वीरमाराम पटेल ने “नमन करें हल्दीघाटी को, नमन करें प्रताप को, बलिदानों की पृष्ठभूमि में निर्मित इस इतिहास को” बोल आधारित कविता पढी। सुनीता निमिष सिंह ने “अरि ऐरी सखि मैं शिव हो जाऊं” पर मधुर कविता पाठ किया।
इस संगोष्ठी में विभागीय सदस्य डॉ. नीतू परिहार ने धन्यवाद ज्ञापित किया। डॉ. नीता त्रिवेदी, डॉ. सुरेश सालवी, डॉ. डोली मोगरा, डॉ. मुरलीधर पालीवाल, डॉ. कुंजन आचार्य, डॉ. दीपिका माली, डॉ. अनिता जोया सहित विभागीय शोधार्थी-विद्यार्थी एवं राजस्थान साहित्य अकादमी के सदस्य उपस्थित रहे।