वर्ल्ड बुक डे : डिजिटल दौर में भी 10 वर्षों में 50 प्रतिशत बढ़ा पुस्तक प्रकाशन, हिंदी प्रकाशन सबसे आगे
उदयपुर, 22 अप्रैल (सुभाष शर्मा): डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-बुक्स के बढ़ते प्रभाव के बावजूद भारत में पुस्तक प्रकाशन उद्योग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। पिछले दस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि देश में पुस्तकों के प्रकाशन में लगभग 50 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि स्पष्ट करती है कि तकनीक के विस्तार के बीच भी पुस्तकों की प्रासंगिकता और पाठकों की रुचि बरकरार है। शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, धार्मिक साहित्य और क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकों की मांग ने प्रकाशन उद्योग को नई ऊर्जा दी है।
वर्ष 2025 तक भारत में लगभग 1.15 लाख नई पुस्तकों के प्रकाशित होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2015 में यह संख्या करीब 75 हजार थी। यानी एक दशक में लगभग 40 हजार नए शीर्षकों की वृद्धि हुई है। इसी के साथ भारत विश्व के शीर्ष पुस्तक प्रकाशन देशों में शामिल हो गया है। भारतीय प्रकाशन उद्योग का बाजार आकार भी बढ़कर 8.5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है, जो 2015 में लगभग 5.5 अरब डॉलर था।
भाषाई प्रकाशन में हिंदी ने सबसे मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। वर्तमान में कुल प्रकाशन में हिंदी की हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत है, जबकि अंग्रेजी की 27 प्रतिशत है। तमिल, बंगाली, मराठी, गुजराती और मलयालम जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में भी तेजी से प्रकाशन बढ़ा है, जिससे भारतीय भाषा साहित्य को नया विस्तार मिला है।
वाइकिंग प्रकाशन के मालिक सतेन्द्र जैन का कहना है कि हालांकि कागज की बढ़ती लागत, पायरेसी और वितरण जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन ऑनलाइन बिक्री और डिजिटल पुस्तकों ने उद्योग को मजबूती प्रदान की है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत की युवा आबादी और शिक्षा के बढ़ते दायरे को देखते हुए आने वाले वर्षों में पुस्तक प्रकाशन उद्योग और अधिक गति पकड़ेगा। साफ है कि भारत में पुस्तकों का संसार सिमट नहीं रहा, बल्कि बदलते समय के साथ और अधिक विस्तृत होता जा रहा है।