जल ऋण चुकाने को छोड़ा अमेरिका

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डॉ. पी. सी. जैन ने 6000 भवनों में गूंजाया ‘कैच द रेन’ का मंत्र
धरती की प्यास बुझाने के लिए स्थगित की विदेश यात्रा; ‘देवास फिल्टर तकनीक’ से देश के ऐतिहासिक कुओं और हैंडपंपों को किया पुनर्जीवित।
सुभाष शर्मा

उदयपुर, 20 जून: “व्यक्ति मातृ और पितृ ऋण की बात तो हमेशा करता है, लेकिन जिस धरती ने हमें जीवन दिया, उसका ‘जल ऋण’ चुकाना भी हमारा परम कर्तव्य है।” इसी सेवा भाव को ध्येय बनाकर उदयपुर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. पी. सी. जैन पिछले 26 वर्षों से भूजल रिचार्जिंग के अभियान में जुटे हैं। जल संरक्षण के प्रति उनकी दीवानगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2015 से 2018 तक लगातार अपने कैंसर विशेषज्ञ पुत्र के पास अमेरिका जाने वाले डॉ. जैन ने वर्ष 2019 में अपनी यात्रा सिर्फ इसलिए रद्द कर दी, ताकि वे देश में रहकर वर्षाकाल में ‘रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग अभियान’ को गति दे सकें।


जीवन के हर पड़ाव को माना ‘जल ऋण’
डॉ. जैन ने अपने जीवन की स्मृतियों से जुड़े जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर अनोखी मिसाल पेश की है:
बाल-ऋण: राणाप्रताप नगर रेलवे स्टेशन की जिस कॉलोनी में उनका बचपन बीता, वहां का 125 साल पुराना ऐतिहासिक कुआं सूख चुका था। डॉ. जैन ने वर्ष 2012 में संस्थाओं के सहयोग से इस पर ‘देवास वाटर फिल्टर सिस्टम’ लगाकर इसे रिचार्ज किया।
किशोर-ऋण: कांकरोली में स्कूल के समय की 40 वर्ष से बंद पड़ी ऐतिहासिक कुई को उन्होंने वर्ष 2015 में तत्कालीन जल मंत्री किरण माहेश्वरी और हिंदुस्तान जिंक के सहयोग से वापस खुलवाकर रिचार्ज किया। इस मॉडल को देखने वर्ल्ड बैंक की टीम भी उदयपुर आई थी।
विद्यार्थी व चिकित्सक ऋण: जहां से डॉ. जैन ने डॉक्टरी की पढ़ाई की, उसी आरएनटी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल परिसर के सभी कुओं व बोरवेलों को उन्होंने भामाशाहों के अनुदान से रेन वाटर हार्वेस्टिंग से जोड़ा। इसके अलावा उन्होंने उदयपुर के सैकड़ों डॉक्टरों को प्रेरित कर उनके क्लीनिकों और घरों में यह सिस्टम लगवाया।
टूटी टांग और जन-जागरण
वर्ष 2015 में एक रेल दुर्घटना में डॉ. जैन का पैर फ्रैक्चर हो गया था, लेकिन प्लास्टर बंधे होने के बावजूद वे लाठी के सहारे हॉस्टलों की छतों पर जाकर तकनीक समझाते रहे। डॉ. जैन अब तक स्वयं लिखित जल-नाटकों और गीतों के माध्यम से देश-विदेश में 1326 से अधिक जल चेतना कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं।
क्या है देवास फिल्टर तकनीक?
यह छत के वर्षा जल को सीधे फिल्टर कर बोरवेल या कुएं के भीतर पहुंचाने की सबसे सस्ती और सरल तकनीक है। इसमें लगे ‘ड्रेन वाल्व’ से पहली दो बारिश का गंदा पानी बाहर निकाल दिया जाता है और साफ पानी आने पर इसे सीधे जल स्रोत से जोड़ दिया जाता है। डॉ. जैन के अनुसार, यदि उदयपुर में औसत छत 2000 वर्ग फीट की हो, तो एक मानसून में 1 लाख लीटर शुद्ध पानी भूजल में उतारा जा सकता है, जो बाजार मूल्य के हिसाब से 20 लाख रुपये का होता है।
अब तक डॉ. जैन के मार्गदर्शन में देश में 6000 से अधिक भवनों और सैकड़ों मृतप्राय हैंडपंपों को पुनर्जीवित किया जा चुका है। डॉ. जैन ने आमजन से अपील की है कि वे इस मानसून अपनी छतों का पानी पाताल में भेजकर धरती मां का ऋण जरूर चुकाएं।