उदयपुर की झीलों से ज्यादा भा रही स्थानीय बोली, ‘पधारो म्हारे देस’ बन रहा यादगार अनुभव
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 19 जून: सिटी पैलेस की भव्यता, पिछोला झील की चमक और अरावली की वादियों के बीच जब कोई विदेशी पर्यटक अचानक “खम्मा घणी” बोल देता है, तो आसपास खड़े स्थानीय लोगों के चेहरे पर भी मुस्कान खिल उठती है। मेवाड़ की धरती पर आने वाले विदेशी पर्यटकों को अब सिर्फ यहां की विरासत ही नहीं, बल्कि मेवाड़ी भाषा की मिठास भी आकर्षित करने लगी है।
उदयपुर के बाजारों, कैफे, हेरिटेज होटलों और गांवों में अक्सर विदेशी पर्यटक स्थानीय शब्द सीखते और बोलते नजर आते हैं। कई बार वे दुकानदारों का अभिवादन “राम-राम सा” से करते हैं तो विदा लेते समय “आवजो” कहना नहीं भूलते। स्थानीय लोगों के लिए यह दृश्य किसी सांस्कृतिक उत्सव से कम नहीं होता
‘हैलो’ नहीं, ‘खम्मा घणी’ पसंद है
टूर गाइडों के अनुसार उदयपुर आने वाले पर्यटकों को सबसे पहले “खम्मा घणी” और “पधारो म्हारे देस” सिखाया जाता है। कई विदेशी पर्यटक पूरे उत्साह के साथ इन शब्दों का अभ्यास करते हैं और फिर स्थानीय लोगों से इन्हीं शब्दों में बातचीत शुरू करते हैं।
फ्रांस, जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया से आने वाले पर्यटकों के लिए यह केवल भाषा नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति को करीब से जानने का माध्यम बन जाता है। कई पर्यटक अपने सोशल मीडिया वीडियो में भी “खम्मा घणी उदयपुर” बोलते दिखाई देते हैं।
बाजारों में बनता है अपनापन
हाथीपोल, बापू बाजार और पुरानी शहर की गलियों में विदेशी पर्यटक जब मेवाड़ी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो दुकानदार भी उत्साह से उनका स्वागत करते हैं। कई बार मोलभाव के दौरान पर्यटक “घणो सरस” कहकर किसी वस्तु की तारीफ करते हैं तो दुकानदार भी हंस पड़ते हैं।
भाषा बन रही पर्यटन की नई पहचान
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय भाषा पर्यटकों को उस स्थान से भावनात्मक रूप से जोड़ती है। जिस तरह जापान, इटली और स्पेन में पर्यटक स्थानीय शब्द सीखने की कोशिश करते हैं, उसी तरह उदयपुर में भी मेवाड़ी शब्द विदेशी मेहमानों को आकर्षित कर रहे हैं।
‘पधारो म्हारे देस’ की ताकत
राजस्थान पर्यटन का प्रसिद्ध नारा “पधारो म्हारे देस” केवल स्वागत का वाक्य नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, आत्मीयता और मेहमाननवाजी का प्रतीक बन चुका है। यही कारण है कि उदयपुर से लौटने वाले अनेक विदेशी पर्यटक झीलों और महलों की तस्वीरों के साथ कुछ मेवाड़ी शब्द भी अपने साथ यादों में लेकर जाते हैं।
मेवाड़ की पहचान अब केवल उसके किलों और झीलों से नहीं, बल्कि उन शब्दों से भी बन रही है जो अनजान मेहमानों को कुछ ही पलों में अपना बना लेते हैं। “खम्मा घणी” की यही मिठास आज दुनिया भर के पर्यटकों को उदयपुर से जोड़ रही है।