विश्व पृथ्वी दिवस संवाद में पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक दायित्व बनाने पर जोर
उदयपुर, 23 अप्रैल: विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर शान्तिपीठ संस्थान के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संवाद में पर्यावरणविदों, इतिहासकारों और प्रबुद्धजनों ने धरती एवं प्रकृति संरक्षण को मानव समाज का मूल दायित्व बताते हुए इसके प्रति संवेदनशील होने का आह्वान किया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजन की परंपरा वैज्ञानिक आधार पर विकसित हुई थी, लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में यह चेतना कमजोर पड़ गई है। यदि समय रहते प्रकृति के नियमों की ओर नहीं लौटे तो जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण क्षरण के गंभीर संकटों से बचना कठिन होगा।
संवाद में मेवाड़ की पहाड़ियों, जलस्रोतों और प्राकृतिक धरोहरों के अंधाधुंध दोहन पर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि लोभवश पहाड़ों, नालों और तालाबों के साथ हो रहा अन्याय भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। सरकार से पर्यावरण निगरानी दल गठित कर जैव विविधता और पारिस्थितिकी संरक्षण के ठोस उपाय लागू करने की मांग की गई।
वरिष्ठ पर्यावरणविदों ने कहा कि अब प्रतीकात्मक अभियानों से आगे बढ़कर व्यावहारिक और जनभागीदारी आधारित प्रयासों की जरूरत है। वैज्ञानिक निगरानी, अवैध कटान पर रोक, जल संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने जैसे कदम अनिवार्य हैं। संवाद में यह निष्कर्ष सामने आया कि पृथ्वी केवल संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है और इसकी रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है।