हाईकोर्ट से भूमि अवाप्ति प्रक्रिया को मिली नई रफ्तार, सरकार के सामने 693 करोड़ का सवाल; विश्वविद्यालय के विस्तार और हजारों परिवारों के हित आमने-सामने
उदयपुर, 18 जुलाई: मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के विस्तार के लिए वर्ष 1981 में शुरू हुई चंपाबाग भूमि अवाप्ति की लड़ाई चार दशक से अधिक समय बाद निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। राजस्थान हाईकोर्ट में विश्वविद्यालय की ओर से दायर अवमानना याचिका के निस्तारण के साथ ही प्रशासन ने भूमि अवाप्ति अधिनियम की धारा 5-ए के तहत संबंधित खातेदारों को नोटिस जारी कर दिए हैं। इससे लंबे समय से ठप पड़ी वैधानिक प्रक्रिया दोबारा शुरू हो गई है।
हालांकि, इस कानूनी प्रगति के समानांतर प्रशासनिक स्तर पर बिल्कुल अलग तस्वीर उभरकर सामने आई है। जिला प्रशासन ने राज्य सरकार को भेजी अपनी विस्तृत रिपोर्ट में पूरी भूमि अवाप्ति प्रक्रिया को समाप्त करने की सिफारिश कर दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नए भूमि अधिग्रहण कानून और वर्तमान डीएलसी दरों के अनुसार 14.59 हेक्टेयर (करीब 57 बीघा) भूमि का अधिग्रहण करने पर सरकार को लगभग 693.33 करोड़ रुपए का मुआवजा देना होगा। प्रशासन का मानना है कि केवल भूमि अधिग्रहण पर इतनी बड़ी सार्वजनिक राशि खर्च करना वित्तीय दृष्टि से उचित नहीं होगा।
कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन फैसला अभी बाकी
हाईकोर्ट में विश्वविद्यालय की ओर से यह तथ्य रखा गया कि 30 मई 2024 के आदेश की पालना में भूमि अवाप्ति अधिकारी एवं तहसीलदार, गिरवा ने धारा 5-ए के नोटिस जारी कर दिए हैं। इस आधार पर न्यायालय ने अवमानना याचिका का निस्तारण कर दिया। इसका अर्थ यह नहीं है कि भूमि अधिग्रहण पूरा हो गया है, बल्कि अब प्रभावित खातेदारों की आपत्तियों पर सुनवाई होगी और सक्षम अधिकारी अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगा। अंतिम निर्णय राज्य सरकार के स्तर पर लिया जाएगा।
43 वर्षों में बदल गई पूरी तस्वीर
जिस भूमि को विश्वविद्यालय के भविष्य के विस्तार के लिए सुरक्षित रखने का उद्देश्य था, वहां पिछले चार दशकों में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। न्यायालय में लंबित रहने और विभिन्न स्थगन आदेशों के दौरान विवादित क्षेत्र में बड़ी संख्या में आवासीय मकान, रिसॉर्ट, वाटिकाएं और व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित हो गए। नगर निगम से पट्टे जारी हुए, रजिस्ट्रियां हुईं तथा प्रशासन ने बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराईं। ऐसे में अब भूमि अधिग्रहण केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती भी बन गया है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
एक ओर हाईकोर्ट के आदेश की पालना में भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन ने अधिग्रहण छोड़ने की अनुशंसा कर दी है। यदि सरकार वित्तीय कारणों से अधिग्रहण निरस्त करने का निर्णय लेती है तो उसे विश्वविद्यालय के भविष्य के विस्तार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी करनी होगी। दूसरी ओर यदि अधिग्रहण जारी रखा जाता है तो भारी मुआवजे, पुनर्वास और लंबे समय से बसे लोगों के हितों से जुड़े जटिल प्रश्न सामने आएंगे।
विश्वविद्यालय की विकास योजनाओं पर भी असर
चंपाबाग भूमि को वर्षों से विश्वविद्यालय के दीर्घकालिक विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यदि यह भूमि उपलब्ध नहीं होती है तो भविष्य में नए शैक्षणिक विभाग, शोध संस्थान, छात्रावास, खेल अधोसंरचना और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक भूमि की आवश्यकता पड़ेगी। इस संबंध में कुलपति प्रो. कैलाश डागा से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने मई 2026 में कार्यभार संभाला है और प्रकरण का विस्तृत अध्ययन करने के बाद ही विश्वविद्यालय का आधिकारिक पक्ष रखा जाएगा।
अब निगाहें राज्य सरकार पर
43 वर्षों से अदालतों, प्रशासनिक फाइलों और सरकारी निर्णयों के बीच उलझा यह मामला अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां राज्य सरकार का एक निर्णय तय करेगा कि विश्वविद्यालय को वर्षों से प्रतीक्षित भूमि मिलेगी या फिर चंपाबाग भूमि अधिग्रहण का यह अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। यह फैसला केवल विश्वविद्यालय या प्रभावित परिवारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश में सार्वजनिक परियोजनाओं, भूमि अधिग्रहण नीति और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा।
फैक्ट बॉक्स : चंपाबाग विवाद एक नजर में
1981 : विश्वविद्यालय विस्तार के लिए भूमि अवाप्ति की प्रक्रिया शुरू।
1982 : प्रभावित पक्ष हाईकोर्ट पहुंचे, मामला लंबित हुआ।
1994 : पुनः अधिसूचना जारी, फिर कानूनी चुनौती।
2007 : धारा 5-ए के तहत आपत्तियां सुनकर खारिज।
2008 : पुनः स्थगन आदेश से प्रक्रिया रुक गई।
30 मई 2024 : हाईकोर्ट ने नई आपत्तियां सुनने के निर्देश दिए।
जुलाई 2026 : धारा 5-ए के नोटिस जारी, अवमानना याचिका समाप्त।
वर्तमान स्थिति : लगभग 693.33 करोड़ रुपए के संभावित मुआवजे के कारण जिला प्रशासन ने अधिग्रहण निरस्त करने की सिफारिश की है, जबकि वैधानिक प्रक्रिया फिलहाल जारी है।