उदयपुर, 13 जुलाई: श्री 1008 चंद्रप्रभ दिगंबर जैन चैत्यालय मुखर्जी चौक में आयोजित नियमित प्रवचन एवं स्वाध्याय श्रृंखला में विद्वान वक्ता डॉ. निलेश शास्त्री ने “मैं शरीर कैसे बन गया?” विषय पर गहन और शास्त्रसम्मत व्याख्यान दिया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं और धर्मप्रेमियों ने आत्मतत्त्व के इस चिंतनपरक प्रवचन का लाभ उठाया।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि आत्मा कभी शरीर नहीं बनती। आत्मा अनादि-अनंत, चेतन और ज्ञानस्वरूप द्रव्य है, जबकि शरीर जड़ और परिवर्तनशील है। वास्तविक समस्या शरीर नहीं, बल्कि जीव की यह मिथ्या मान्यता है कि “मैं शरीर हूँ”। यही भ्रम संसार और बंधन का मूल कारण है।
उन्होंने समयसार के सिद्धांतों को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेने से रस्सी साँप नहीं बन जाती, उसी प्रकार शरीर को अपना स्वरूप मान लेने से आत्मा शरीर नहीं बन जाती। परिवर्तन वस्तु में नहीं, बल्कि दृष्टि और मान्यता में होता है।
आचार्य कुन्दकुन्ददेव, आचार्य अमृतचंद्र और आचार्य जयसेन के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब जीव स्वयं को शरीर से पृथक ज्ञायक-द्रष्टा आत्मा के रूप में अनुभव करता है, तभी सम्यग्दर्शन का उदय होता है और मोक्षमार्ग का द्वार खुलता है। प्रवचन के अंत में श्रद्धालुओं ने इसे आत्मचिंतन और आत्मबोध की दिशा में अत्यंत प्रेरणादायी बताया।