■डॉ. विजय विप्लवी■
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल राजनीतिक स्थिरता की नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ और न्यायपूर्ण विकास मॉडल के निर्माण की थी। इसी संदर्भ में देश के बौद्धिक और राजनीतिक विमर्श में दो प्रमुख दृष्टिकोण उभरकर सामने आए—एक ओर जवाहरलाल नेहरू का आधुनिक, औद्योगिक और राज्य-नियोजित विकास मॉडल, और दूसरी ओर दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय चिंतन पर आधारित एकात्म मानवदर्शन।
पं. नेहरू का मानना था कि भारत को गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त कराने के लिए तीव्र औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक विकास आवश्यक है। उन्होंने नियोजन आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए सार्वजनिक क्षेत्र, भारी उद्योगों और बड़े बुनियादी ढाँचों को प्राथमिकता दी। उनके अनुसार, इस प्रकार का विकास न केवल आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करेगा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम बनेगा। उन्होंने बड़े उद्योगों और बाँधों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा, जो उनके दृष्टिकोण की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।
इसके विपरीत, पं. दीनदयाल उपाध्याय ने इस मॉडल की सीमाओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए विकास की एक वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत की। 1965 में दिए गए अपने व्याख्यानों में उन्होंने एकात्म मानवदर्शन का प्रतिपादन किया, जिसमें मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई न मानकर एक समग्र अस्तित्व के रूप में देखा गया। उनका मानना था कि विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन और उपभोग बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव जीवन के चारों आयामों—शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—का संतुलित विकास होना चाहिए।
आर्थिक संरचना के स्तर पर नेहरू का मॉडल केंद्रीकृत नियोजन पर आधारित था। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से संसाधनों का आवंटन और विकास की दिशा तय की जाती थी। इसके विपरीत, उपाध्याय ने विकेंद्रीकरण का समर्थन करते हुए कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके गाँवों में निहित है। उन्होंने लघु, कुटीर और स्वदेशी उद्योगों को प्राथमिकता देने की बात कही, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सके। यह दृष्टिकोण महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज्य के विचारों से प्रेरित था।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रश्न पर भी दोनों नेताओं के विचारों में अंतर स्पष्ट था। नेहरू ने कृषि सुधारों को महत्व दिया, किंतु उनकी प्राथमिकता औद्योगिक विकास पर अधिक केंद्रित रही। उनका विश्वास था कि औद्योगिकीकरण के माध्यम से उत्पन्न संपन्नता अंततः कृषि क्षेत्र को भी लाभान्वित करेगी। दूसरी ओर, उपाध्याय ने कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला मानते हुए ग्रामीण विकास को केंद्र में रखने की वकालत की। उनके अनुसार, जब तक गाँवों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुदृढ़ नहीं होगी, तब तक समग्र राष्ट्रीय विकास संभव नहीं है।
तकनीक और आधुनिकता के संदर्भ में नेहरू का दृष्टिकोण आधुनिकतावादी था। वे विज्ञान और तकनीक को विकास का अनिवार्य साधन मानते थे। इसके विपरीत, उपाध्याय ने ‘स्वदेशानुकूल तकनीक’ पर बल दिया। उनका कहना था कि भारत जैसे श्रम-प्रधान देश में ऐसी तकनीक अपनाई जानी चाहिए, जो रोजगार सृजन में सहायक हो, न कि बेरोजगारी को बढ़ावा दे।
विकास के लक्ष्य को लेकर भी दोनों विचारकों के बीच मौलिक अंतर था। पं. नेहरू के लिए विकास का मापदंड आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन और आधुनिक संस्थाओं का निर्माण था। इसके विपरीत, पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘अंत्योदय’ की अवधारणा को केंद्र में रखते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान को विकास का वास्तविक लक्ष्य बताया। उनका मानना था कि जब तक समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक समृद्धि का लाभ नहीं पहुँचता, तब तक विकास अधूरा रहेगा।
राज्य की भूमिका को लेकर भी दोनों दृष्टिकोणों में अंतर देखा जा सकता है। नेहरू एक सशक्त और सक्रिय राज्य के पक्षधर थे, जो विकास की प्रक्रिया का नेतृत्व करे। वहीं, उपाध्याय ने राज्य को समाज का एक अंग मानते हुए उसकी भूमिका को सीमित और सहायक बताया। उनके अनुसार, समाज की आत्मनिर्भरता और नैतिक शक्ति ही वास्तविक विकास का आधार है।
नेहरू और दीनदयाल उपाध्याय के बीच का यह वैचारिक विमर्श भारतीय विकास-चिंतन के दो महत्वपूर्ण आयामों को प्रस्तुत करता है। एक ओर आधुनिक औद्योगिक विकास का केंद्रीकृत मॉडल है, तो दूसरी ओर भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित विकेंद्रीकृत और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण। एक विचारधारा ने भौतिक और वैज्ञानिक विकास को आधार माना, तो दूसरी विचारधारा में शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा के विकास के आधार पर व्यक्ति निर्माण पर जोर दिया। व्यक्ति का निर्माण सही हुआ तो वह संतुलित भौतिक व वैज्ञानिक विकास स्वतः कर लेगा।
आज जब विकास की दौड़ में कई बार सामाजिक संतुलन, सांस्कृतिक मूल्यों और अंतिम व्यक्ति का हित पीछे छूटता दिखाई देता है, तब पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन अधिक व्यापक और स्थायी समाधान प्रस्तुत करता प्रतीत होता है। यह दृष्टिकोण केवल अर्थव्यवस्था को नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को केंद्र में रखता है। इसी कारण वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि विकास की भारतीय दिशा के लिए दीनदयाल जी का विचार अधिक संतुलित, मानवीय और दीर्घकालिक रूप से प्रभावी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
(लेखक भाजपा नेता है, और पं. दीनदयाल उपाध्याय के पत्रकार जीवन पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त है)
संदर्भ:-
भारत एक खोज, पंडित जवाहरलाल नेहरू
विश्व इतिहास की झलक, पंडित जवाहरलाल नेहरू
एकात्म मानववाद, पंडित दीनदयाल उपाध्याय (1965 के व्याख्यान)
पॉलिटिकल डायरी (राजनीतिक डायरी), पंडित दीनदयाल उपाध्याय
भारत की योजना आयोग, द्वितीय पंचवर्षीय योजना दस्तावेज