‘अमृतम अनंतम आलोकम्’ में साकार हुआ सनातन संस्कृति का विराट दर्शन

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आलोक हिरण मगरी के स्वर्ण जयंती समारोह में उमड़ा जनसैलाब, एक हजार विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों ने रचा इतिहास
तीन घंटे तक श्रीराम स्टेडियम में गूंजे वैदिक मंत्र, शिव तांडव, शक्ति आराधना और कृष्ण भक्ति के स्वर; रोमांचित और भावविभोर हुए हजारों दर्शक
आलोक ने चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण की गौरवशाली परंपरा स्थापित की : ताराचंद जैन
आलोक का विद्यार्थी होने के नाते श्रम, अनुशासन और जीवन प्रबंधन के सूत्र सीखे : पारस सिंघवी
शिक्षा, संस्कार और अध्यात्म का समन्वय ही आलोक का जीवन दर्शन : डॉ. प्रदीप कुमावत
उदयपुर, 1 नवंबर।
शिक्षा, संस्कार, अध्यात्म, भारतीय जीवन मूल्यों और सनातन संस्कृति के अद्भुत समन्वय का ऐतिहासिक साक्षी बना आलोक संस्थान हिरण मगरी का स्वर्ण जयंती समारोह ‘अमृतम अनंतम आलोकम्’। आलोक हिरण मगरी के गौरवशाली 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में शनिवार, 31 अक्टूबर को आयोजित इस भव्य समारोह में श्रीराम स्टेडियम का विशाल प्रांगण दर्शकों से खचाखच भर गया। तीन घंटे तक चले इस अविस्मरणीय आयोजन में एक हजार छात्र-छात्राओं ने अपनी अद्भुत सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक प्रस्तुतियों से सनातन संस्कृति के विराट स्वरूप को मंच पर साकार कर दिया।
कार्यक्रम में वैदिक ऋचाओं की पवित्र गूंज, भगवान शिव के रौद्र एवं कल्याणकारी स्वरूप, आदिशक्ति की दिव्य आराधना, भगवान श्रीकृष्ण की मनोहारी लीलाओं और भारतीय जीवन दर्शन की प्रभावशाली प्रस्तुतियों ने ऐसा समां बांधा कि दर्शक कभी रोमांचित हुए, कभी भावविभोर और कभी भक्ति के सागर में डूबते नजर आए। अनेक प्रस्तुतियों ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। तालियों की गड़गड़ाहट से बार-बार पूरा स्टेडियम गूंज उठा। समारोह के मुख्य अतिथि उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन, उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा तथा महापौर पारस सिंघवी थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता आलोक संस्थान के निदेशक डॉ. प्रदीप कुमावत ने की।
वैदिक मंत्रों और भद्रमंडल निर्माण से हुआ आध्यात्मिक शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार एवं ऋचाओं के पवित्र स्वरों के बीच भव्य भद्रमंडल निर्माण के साथ हुआ। इसके पश्चात भगवान गणेश की स्तुति एवं मां सरस्वती की वंदना ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक चेतना से भर दिया। विशाल मंच पर विद्यार्थियों ने भगवान शिव के तांडव, शिव तांडव स्तोत्र, नवदुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों एवं महिषासुर मर्दिनी का ऐसा प्रभावशाली मंचन किया कि पूरा वातावरण शिव और शक्ति की आराधना में डूब गया। सजीव अभिनय, भव्य वेशभूषा, संगीत, प्रकाश संयोजन और विद्यार्थियों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने इन प्रस्तुतियों को अत्यंत प्रभावशाली बना दिया। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, उनके जीवन के विभिन्न प्रसंगों तथा भक्ति से ओतप्रोत प्रस्तुतियों ने दर्शकों को द्वापर युग की अनुभूति कराई। भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को जिस कलात्मकता, अनुशासन और आध्यात्मिक भाव के साथ प्रस्तुत किया गया, उसने समारोह को सामान्य सांस्कृतिक आयोजन से कहीं ऊपर उठाकर एक विराट सांस्कृतिक महोत्सव का स्वरूप प्रदान कर दिया।
मोबाइल की लत छोड़ो, मैदान और भारतीय खेलों से नाता जोड़ो
कार्यक्रम की विशेषता यह भी रही कि सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक प्रस्तुतियों के साथ आधुनिक समाज की चुनौतियों को भी मंच पर प्रभावशाली ढंग से उठाया गया।
मोबाइल के बढ़ते दुष्प्रभाव, बच्चों में स्क्रीन की लत तथा पारंपरिक खेलों से दूर होती नई पीढ़ी की समस्या को विद्यार्थियों ने अत्यंत रोचक एवं संदेशपरक प्रस्तुति के माध्यम से दर्शाया।
इस प्रस्तुति ने संदेश दिया कि बच्चों का वास्तविक बचपन मोबाइल की स्क्रीन में नहीं, बल्कि खेल के मैदानों, पारिवारिक संवाद, प्रकृति के सान्निध्य और भारतीय पारंपरिक खेलों में बसता है। इस सामाजिक संदेश को उपस्थित अभिभावकों एवं दर्शकों ने विशेष रूप से सराहा।
आलोक ने केवल विद्यार्थी नहीं, राष्ट्र के श्रेष्ठ नागरिक तैयार किए : ताराचंद जैन
मुख्य अतिथि विधायक ताराचंद जैन ने आलोक संस्थान की स्वर्णिम यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि आलोक ने पांच दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के साथ चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने कहा कि आलोक से शिक्षा प्राप्त अनेक विद्यार्थी आज देश-विदेश में उच्च पदों पर कार्य करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह संस्थान की शिक्षा और संस्कारों की सफलता का प्रमाण है। जैन ने संस्थान के संस्थापक आचार्य श्यामलाल कुमावत का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कहा कि भारतीय नववर्ष को जन-जन तक पहुंचाने और समाज में उसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में आलोक संस्थान की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कश्मीर आंदोलन में आचार्य श्यामलाल कुमावत की सक्रिय भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि आचार्य ने शिक्षा को सदैव राष्ट्र और समाज की सेवा का माध्यम माना। जैन ने डॉ. प्रदीप कुमावत को साधुवाद देते हुए कहा कि उन्होंने अपने पिता एवं संस्थापक आचार्य की गौरवशाली परंपराओं, सांस्कृतिक चेतना और शिक्षा के आदर्शों को निरंतर आगे बढ़ाने का कार्य किया है।
आलोक ने मुझे श्रम की प्रतिष्ठा और स्वयं काम करने की प्रेरणा दी : महापौर पारस सिंघवी
महापौर पारस सिंघवी ने अपने विद्यार्थी जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उन्हें गर्व है कि वे आलोक संस्थान के विद्यार्थी रहे हैं। उन्होंने कहा कि आलोक में विद्यार्थी रहते हुए उन्होंने जीवन प्रबंधन के अनेक महत्वपूर्ण सूत्र सीखे। विशेष रूप से श्रम करने की प्रवृत्ति, स्वयं आगे बढ़कर कार्य करने की आदत, अनुशासन, जिम्मेदारी और कार्य के प्रति समर्पण जैसे संस्कार उनके व्यक्तित्व निर्माण में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए। उन्होंने कहा कि आलोक से मिले ये संस्कार आज भी उनके सार्वजनिक जीवन और कार्यशैली में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
आलोक केवल विद्यालय नहीं, जीवन को आलोकित करने वाला दर्शन है : डॉ. प्रदीप कुमावत
समारोह की अध्यक्षता करते हुए आलोक संस्थान के निदेशक डॉ. प्रदीप कुमावत ने कहा कि आलोक की 50 वर्षों की यह यात्रा केवल एक विद्यालय या शिक्षण संस्थान की यात्रा नहीं, बल्कि असंख्य विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और समर्पित आत्माओं की साधना, संस्कार और सेवा की अनंत यात्रा है। उन्होंने कहा कि संस्थापक आचार्य श्यामलाल कुमावत ने जिस जीवन दर्शन और शिक्षा दर्शन की नींव रखी थी, आलोक आज भी उन्हीं आदर्शों पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, “हमारा विश्वास है कि ज्ञान मनुष्य को योग्य बनाता है, लेकिन संस्कार उसे श्रेष्ठ बनाते हैं। शिक्षा जब अध्यात्म, चरित्र और जीवन मूल्यों से जुड़ती है, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है।” उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान, तकनीक और नवाचार के साथ भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और सनातन जीवन मूल्यों का समन्वय ही आलोक की वास्तविक पहचान है आलोक का उद्देश्य केवल सफल विद्यार्थी तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करना है, जो अपने ज्ञान और कर्म से समाज एवं राष्ट्र को नई दिशा दे सकें। उन्होंने कहा कि आज का यह आयोजन आलोक के जीवन दर्शन का मंचीय प्रकटीकरण है, जिसमें शिक्षा, संस्कृति, अध्यात्म, भक्ति और सामाजिक चेतना को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया गया है।