प्रो. अजात शत्रु सिंह शिवरती बोले- जल संरक्षण, पर्यावरण और सतत विकास में उपयोगी है पारंपरिक ज्ञान
उदयपुर, 2 अक्टूबर: ग्लोबल संस्कृत फोरम एवं ग्लोबल कल्चर लॉज के संयुक्त तत्वावधान में संस्कृत स्टडी सेंटर, सिलपाकोर्न विश्वविद्यालय, बैंकाक, थाईलैंड में ‘भारतीय ज्ञान परंपराएं : संस्कृतियों पर ज्ञान परंपराओं के मध्य सेतु’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। इसमें ग्लोबल हिस्ट्री फोरम के संस्थापक महासचिव एवं विशिष्ट अतिथि प्रो. अजात शत्रु सिंह शिवरती ने भारतीय ज्ञान परंपरा को जीवन, संस्कृति और प्रकृति के संतुलन पर आधारित बताया।
उन्होंने कहा कि मेवाड़ की बावड़ियां, तालाब, झीलें, लोकपरंपराएं, आयुर्वेद और स्थापत्य भारतीय ज्ञान-विरासत के जीवंत उदाहरण हैं। यह पारंपरिक ज्ञान आज जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए उपयोगी है। इसके वैज्ञानिक अध्ययन के साथ युवा पीढ़ी को भी इससे जोड़ना आवश्यक है।
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य को समझने की महत्वपूर्ण कुंजी है। मुख्य अतिथि थाईलैंड में भारत के राजदूत पुनीत अग्रवाल ने भारत-थाईलैंड के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री से सम्मानित थाई प्रोफेसर डॉ. चीरापत प्रपांडविद्या ने संस्कृत को शिक्षा, शोध और आधुनिक ज्ञान से जोड़ने पर जोर दिया।
इस अवसर पर शिवरती शोध पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित ‘संत तुल्य महाराज शत्रु दमन सिंह शिवरती की हस्तलिखित श्रीमद्भगवद्गीता की टीका’ के द्वितीय खंड का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में डॉ. तीराकियात जारोएनसेत्तासिन, डॉ. ब्रह्मदेव राम त्रिपाठी, सुशील कुमार धनुका, डॉ. ओल्गा नोविका, प्रो. बलराम पाणी सहित देश-विदेश के शिक्षाविद, इतिहासकार और संस्कृतविद मौजूद रहे। धन्यवाद आयोजन सचिव डॉ. वुत्तीफोग थाइंसोम्बैट ने दिया।