झीलें तो भर जाएंगी, लेकिन उदयपुर का जल भविष्य कितना सुरक्षित?

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मुद्दा: कैचमेंट में निर्माण, सीवरेज, अतिक्रमण और बदलती बारिश के बीच झीलों की असली चुनौती; पानी से ज्यादा जरूरी है उसका प्राकृतिक रास्ता बचाना
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 22 अगस्त:
उदयपुर में जब फतहसागर, पिछोला और उदयसागर का जलस्तर बढ़ता है तो शहर में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है। झीलों की पाल पर भीड़ उमड़ती है, तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा जाती हैं और पर्यटन कारोबार को नई ऊर्जा मिलती है। लेकिन इस खूबसूरत तस्वीर के पीछे एक बड़ा सवाल भी खड़ा है—क्या उदयपुर की झीलें केवल इस मानसून के लिए भर रही हैं या आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित हैं?
उदयपुर की पहचान उसकी झीलों और अरावली पहाड़ियों से है। झीलें केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरण, भूजल, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी हैं। ऐसे में झील में पानी आना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि कैचमेंट क्षेत्र, जलप्रवाह मार्ग और झील का पेटा सुरक्षित रहे।
पानी झील में पहुंचता कैसे है?
उदयपुर की झील व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़े जलस्रोतों का बड़ा तंत्र है। बारिश का पानी अरावली की पहाड़ियों और आसपास के कैचमेंट से बहकर छोटे-बड़े जलस्रोतों में पहुंचता है। इसके बाद विभिन्न जलप्रवाहों के माध्यम से शहर की प्रमुख झीलों तक पानी पहुंचता है। यही प्राकृतिक व्यवस्था उदयपुर को अन्य शहरों से अलग बनाती है। लेकिन जहां पानी के प्राकृतिक रास्ते पर निर्माण, मिट्टी का भराव, अतिक्रमण या कचरा जमा होता है, वहां बारिश का पानी झील तक पहुंचने के बजाय रास्ता बदल सकता है। इसका असर एक झील पर नहीं, पूरे सिस्टम पर पड़ सकता है।
असली खतरा झील के अंदर से ज्यादा बाहर
झील संरक्षण की चर्चा होते ही सामान्यतः झील की पाल, पानी की गुणवत्ता या जलस्तर पर ध्यान जाता है। जबकि विशेषज्ञों के अनुसार किसी झील का भविष्य उसके कैचमेंट से तय होता है। कैचमेंट में जंगल, पहाड़, खेत, नाले और प्राकृतिक जलधाराएं शामिल होती हैं। इन्हीं क्षेत्रों से बारिश का पानी झील में पहुंचता है। यदि यहां कंक्रीट का विस्तार बढ़ता है तो पानी जमीन में रिसने के बजाय तेज गति से बह सकता है। इससे एक ओर अचानक जलभराव और दूसरी ओर भूजल रिचार्ज में कमी जैसी स्थिति बन सकती है।
उदयसागर ने फिर याद दिलाई चुनौती
हाल में उदयसागर क्षेत्र में कथित अवैध भराव को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर झील संरक्षण व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। यदि किसी जलग्रहण अथवा प्राकृतिक जलप्रवाह क्षेत्र में बिना अनुमति भराव होता है तो उसका असर केवल उस जमीन तक सीमित नहीं रहता। पर्यावरणप्रेमी राहुल शर्मा सवाल उठाते हैं कि किसी भी भराव से पहले क्या यह देखा जाता है कि वहां से बारिश का पानी किस दिशा में जाता है? क्या संबंधित विभागों के पास प्रत्येक प्रमुख जलप्रवाह और कैचमेंट का अद्यतन डिजिटल रिकॉर्ड है? क्या मौके पर नियमित निगरानी होती है? इन सवालों का जवाब सिर्फ कार्रवाई से नहीं, बल्कि पारदर्शी रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।
सीवरेज भी बड़ी चुनौती
झीलों के लिए दूसरा बड़ा खतरा सीवरेज है। शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में यदि घरेलू या अन्य गंदा पानी प्राकृतिक नालों के माध्यम से झीलों तक पहुंचता है तो जल गुणवत्ता प्रभावित होती है। हाल में रामसर साइट मेनार में सीवरेज की समस्या को लेकर सामने आई शिकायत ने भी यही सवाल खड़ा किया है कि अंतरराष्ट्रीय महत्व वाले जलक्षेत्रों की निगरानी कितनी प्रभावी है।
बारिश का बदलता पैटर्न भी चुनौती
उदयपुर में बारिश का स्वरूप भी पहले जैसा स्थिर नहीं माना जा सकता। कभी कम समय में बहुत तेज बारिश होती है तो कभी लंबे अंतराल तक बारिश नहीं होती। ऐसे में शहर के जल प्रबंधन की रणनीति केवल ‘झील भर गई’ तक सीमित नहीं रह सकती। मेवाड़ के जलपुरुष डॉ. पीसी जैन कहते हैं कि भविष्य की योजना में यह देखना होगा कि अत्यधिक बारिश के समय पानी सुरक्षित तरीके से झीलों तक पहुंचे और अतिरिक्त पानी के लिए प्राकृतिक निकासी व्यवस्था भी बाधित न हो।
झीलें बचीं तो पर्यटन बचेगा
होटल कारोबारी जीतेंद्र सिंह झाला का कहना है कि उदयपुर का पर्यटन सीधे झीलों और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ा है। होटल, रेस्तरां, नाव संचालन, स्थानीय परिवहन, गाइड, हस्तशिल्प और हजारों छोटे कारोबार किसी न किसी रूप में पर्यटन से जुड़े हैं। इसलिए झील संरक्षण को केवल पर्यावरण विभाग की जिम्मेदारी मानना बड़ी भूल होगी। यह नगर नियोजन, पर्यटन, जल संसाधन, वन, नगर निगम और जिला प्रशासन—सभी से जुड़ा विषय है। वे कहते हैं कि उदयपुर को अब ऐसी झील नीति की जरूरत है जिसमें केवल झील की सफाई या सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि पूरे जलग्रहण क्षेत्र को शामिल किया जाए।