ट्यूबवेल और सिंचाई दबाव से गिर रहा जलस्तर, 5–10 साल में गंभीर संकट की आशंका
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 27 मार्च: उदयपुर संभाग में भूजल की स्थिति धीरे-धीरे चिंताजनक होती जा रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और राजसमंद जिले सेमी-क्रिटिकल से क्रिटिकल श्रेणी की ओर बढ़ रहे हैं, जहां जलस्तर 30 से 70 मीटर तक नीचे पहुंच चुका है। शहरी क्षेत्रों और सिंचित इलाकों में ट्यूबवेलों के अत्यधिक उपयोग ने भूजल पर दबाव और बढ़ा दिया है, जिससे भविष्य में पेयजल संकट की आशंका गहराने लगी है।
वहीं डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ जिलों में फिलहाल स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है। इन क्षेत्रों में जलस्तर 5 से 40 मीटर के बीच है, जिसका मुख्य कारण अधिक वर्षा, वन क्षेत्र और प्राकृतिक जल पुनर्भरण है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन जिलों में भी तेजी से बढ़ते बोरवेल और सिंचाई के दबाव से आने वाले समय में स्थिति बिगड़ सकती है।
मैदानी क्षेत्रों में तेजी से गिर रहा जलस्तर
भूजल संरक्षण को लेकर सक्रिय डॉ. पीसी जैन के अनुसार उदयपुर जिले के गोगुंदा, झाड़ोल और कोटड़ा जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में अभी जलस्तर संतुलित बना हुआ है, लेकिन मावली और वल्लभनगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। लगातार गहराते बोरवेल इस बात का संकेत हैं कि पानी का दोहन रिचार्ज से कहीं अधिक हो रहा है। उन्होंने कहा, यदि वर्षा जल संचयन, माइक्रो इरिगेशन और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले 5 से 10 वर्षों में उदयपुर संभाग भी गंभीर भूजल संकट की चपेट में आ सकता है।
प्रदेश के अधिकांश जिले ‘डार्क जोन’ की ओर
राजस्थान के कई जिले जैसे जयपुर, अलवर, झुंझुनूं, सीकर, नागौर, जोधपुर और बाड़मेर पहले ही ओवर-एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में पहुंच चुके हैं, जहां जलस्तर 100 से 300 फीट तक नीचे चला गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार भूजल का उपयोग उपलब्धता से 191 प्रतिशत अधिक हो चुका है, जिससे हर वर्ष औसतन 1.61 मीटर जलस्तर गिर रहा है।
संभाग की भूजल स्थिति (जिला अनुसार)
उदयपुर: सेमी-क्रिटिकल (20–60 मीटर)
डूंगरपुर: सामान्य (10–40 मीटर)
बांसवाड़ा: सुरक्षित (10–30 मीटर)
प्रतापगढ़: सुरक्षित (5–25 मीटर)
राजसमंद: क्रिटिकल (30–70 मीटर)
चित्तौड़गढ़: सेमी-क्रिटिकल (5–50 मीटर)