राज्यपाल कटारिया की जनसुनवाई पर विवाद, अधिवक्ता ने लिखा खुला पत्र
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संवैधानिक मर्यादा, राजनीतिक हस्तक्षेप और उदयपुर दौरों पर उठाए सवाल; 40 साल पुराने संबंधों का भी किया उल्लेख
उदयपुर, 22 मई: पंजाब के राज्यपाल Gulab Chand Kataria के उदयपुर में प्रस्तावित जनसुनवाई कार्यक्रम को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। एक अधिवक्ता ने राज्यपाल को लंबा खुला पत्र लिखकर 24 मई को उदयपुर सर्किट हाउस में प्रस्तावित जनसुनवाई को “संविधानेत्तर” बताते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि राज्यपाल संवैधानिक पद पर रहते हुए बार-बार अपने गृह राज्य राजस्थान, विशेषकर उदयपुर आकर प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रहे हैं, जो संविधान की संघीय व्यवस्था और परंपराओं के खिलाफ है।
गृह राज्य के दौरों और जनसुनवाई पर आपत्ति
पत्र में राज्यपाल (भत्ते और विशेषाधिकार) संशोधन नियम 2015 का हवाला देते हुए कहा गया है कि राज्यपालों को अपने गृह राज्य के बार-बार दौरों से बचने की सलाह दी गई है। इसके बावजूद मई माह में यह उनका दूसरा उदयपुर दौरा बताया गया है। अधिवक्ता ने कहा कि राज्यपाल द्वारा उदयपुर में जनसुनवाई आयोजित करना प्रदेश सरकार, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के अधिकार क्षेत्र में सीधा हस्तक्षेप है।
पत्र में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153, 154 और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा गया कि प्रत्येक राज्य के लिए अलग राज्यपाल और अलग कार्यपालिका व्यवस्था निर्धारित है, ऐसे में दूसरे राज्य में जाकर प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।
राजनीतिक गतिविधियों और बयानों पर भी सवाल
अधिवक्ता ने पत्र में राज्यपाल के पूर्व राजनीतिक बयानों और उदयपुर में कथित गुटबाजी का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि राज्यपाल ने पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी की थी, जिससे उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका झलकती है। पत्र में यह भी कहा गया कि उदयपुर भाजपा में उनके “गुट” की चर्चा सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुकी है।
पत्र में कई पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों का भी जिक्र किया गया है, जिनमें संगठन चुनाव, टिकट वितरण, भाजपा नेताओं के साथ विवाद और विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता को शामिल किया गया। लेखक ने आरोप लगाया कि संवैधानिक पद पर रहते हुए स्थानीय राजनीति में सक्रिय दिखाई देना राज्यपाल पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
40 वर्षों के संबंधों का उल्लेख
पत्र का बड़ा हिस्सा लेखक और गुलाबचंद कटारिया के चार दशक पुराने संबंधों पर आधारित है। लेखक ने बताया कि 1985 से लेकर कई चुनावों और संगठनात्मक गतिविधियों में उन्होंने कटारिया के साथ कार्य किया। उन्होंने दावा किया कि वर्षों तक भाजपा संगठन में सक्रिय रहने के बावजूद उन्हें बाद में संगठनात्मक जिम्मेदारियों से दूर कर दिया गया।
अधिवक्ता ने यह भी लिखा कि कटारिया के कारण उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन उसी अवधि में उन्होंने शिक्षा और शोध के क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल कीं। उन्होंने अपने पीएचडी शोध और पुस्तक “पत्रकार दीनदयाल उपाध्याय” का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्यपाल से साक्षात्कार के दौरान उन्हें उपेक्षा का सामना करना पड़ा।
विकास कार्यों और लोकार्पण पर टिप्पणी
पत्र में उदयपुर में विभिन्न लोकार्पण कार्यक्रमों, सार्वजनिक मंचों और सरकारी आयोजनों में राज्यपाल की सक्रियता पर भी सवाल उठाए गए। लेखक ने आरोप लगाया कि राजस्थान सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अधिकार क्षेत्र वाले कार्यक्रमों में उनकी भूमिका समानांतर सत्ता केंद्र जैसा संदेश देती है।
अंत में अधिवक्ता ने राज्यपाल से संवैधानिक मर्यादा, संघीय ढांचे और परंपराओं का सम्मान करने की अपील करते हुए कहा कि वे उदयपुर में प्रस्तावित जनसुनवाई को निरस्त करें तथा राजस्थान सरकार और स्थानीय प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप से बचें।
