एमपीयूएटी के स्थापना दिवस पर प्राकृतिक खेती और नवाचार पर जोर
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विश्वविद्यालय की आय में 25 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य, तीन वैज्ञानिक विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत में शामिल होने पर सम्मानित
उदयपुर, 1 नवंबर: कृषि को टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्राकृतिक खेती, भूमि की उर्वरता का संरक्षण और आधुनिक तकनीक का समन्वय जरूरी है। पंचगव्य आधारित प्राकृतिक कृषि से मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने के साथ कृषि क्षेत्र को नई दिशा मिल सकती है। यह विचार भारतीय जनसंचार संस्थान, जम्मू के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. दिलीप कुमार ने महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के 27वें स्थापना दिवस समारोह में व्यक्त किए।
राजस्थान कृषि महाविद्यालय स्थित महाराणा प्रताप सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने की। डॉ. कुमार ने कहा कि कृषि शिक्षा और अनुसंधान में प्रकृति संरक्षण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। विश्वविद्यालय को किसान परिवारों से जुड़े ऐसे युवा तैयार करने चाहिए, जो नवाचार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दें। उन्होंने नक्षत्र वाटिका स्थापित करने का सुझाव भी दिया।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक डॉ. शांति कुमार शर्मा ने विकसित भारत-2047 के लक्ष्य में विश्वविद्यालयों की भूमिका बताते हुए ई-गवर्नेंस, कौशल विकास और स्टार्टअप को प्रोत्साहन देने पर जोर दिया। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. कैलाश डांगा ने कृषि नवाचार, उन्नत खेती और पशुपालन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
तीन वैज्ञानिकों और 13 किसानों का सम्मान
कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय की आय में इस वर्ष 25 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य घोषित किया। समारोह में विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में स्थान पाने वाले डॉ. एन.एल. पंवार, डॉ. विनोद सहारण और डॉ. देवेंद्र जैन को सम्मानित किया गया। साथ ही दक्षिणी राजस्थान के 13 प्रगतिशील जनजाति किसानों को कृषि नवाचार के लिए सम्मान मिला। इस अवसर पर कृषि संबंधी पुस्तकों और तकनीकी प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया।

