कुंभलगढ़ की ऐतिहासिक की बैरकों में फ्लश की गूंज
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अनदेखी : 200 साल पुरानी जेल को बना दिया टॉयलेट, जहां कभी कैद थे स्वतंत्रता सेनानी
उदयपुर, 21 मई: विश्व धरोहर कुंभलगढ़ दुर्ग में इतिहास संरक्षण को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विरासत संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अरावली की पहाड़ियों में बसे इस ऐतिहासिक दुर्ग की तलहटी में स्थित करीब 200 वर्ष पुरानी रियासतकालीन जेल की बैरकों को अब महिला और पुरुष शौचालय में बदल दिया गया है। जिन कमरों में कभी स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक बंदियों को नजरबंद रखा जाता था, वहां अब फ्लश, टाइल्स और यूरिनल लगे हुए हैं।
इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि विरासत के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सुविधाओं के नाम पर इतिहास की पहचान मिटाई जा सकती है?

जानकारी के अनुसार रियासतकालीन जेल परिसर में करीब 10 बैरकें मौजूद हैं। इनमें से चार बैरकों को भारतीय पुरातत्व विभाग ने पर्यटकों की सुविधा के नाम पर शौचालय में तब्दील कर दिया। अन्य कमरों में पुलिस चौकी और कर्मचारियों के आवास संचालित हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि परिसर में अन्य स्थान उपलब्ध होने के बावजूद ऐतिहासिक बैरकों को शौचालय में बदलना समझ से परे है। पहले अलग स्थान पर बने शौचालयों को बाद में बेबी केयर रूम में परिवर्तित कर दिया गया और इसके बाद जेल की बैरकों का उपयोग शुरू हो गया।
स्वतंत्रता आंदोलन की गवाह रही जेल
इतिहासकार दिनेश श्रीमाली के अनुसार वर्ष 1931 में स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा को अंग्रेजों ने यहीं नजरबंद रखा था। इसके अलावा 1938 में प्रोफेसर नारायणदास बागोरा सहित कई सेनानियों को भी इसी जेल में रखा गया। ब्रिटिश शासन में यह दुर्ग राजनीतिक बंदियों और खूंखार अपराधियों के लिए सुरक्षित खुली जेल माना जाता था।
संरक्षण या सुविधाओं के नाम पर विरासत से समझौता?
इतिहासवेत्ता राहुल शर्मा का कहना है कि दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार वाले कुंभलगढ़ दुर्ग की ऐतिहासिक पहचान आज संरक्षण बनाम सुविधा की बहस के केंद्र में आ गई है। विभागीय कर्मचारी भी स्वीकार कर रहे हैं कि वर्तमान शौचालय कभी रियासतकालीन जेल की बैरकें थीं, लेकिन आधिकारिक स्तर पर कोई जवाब देने से बचा जा रहा है।
