LOADING

Type to search

अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जरूरी : प्रशांत अग्रवाल

Local

अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जरूरी : प्रशांत अग्रवाल

Share

उदयपुर, 10 सितम्बर: नारायण सेवा संस्थान में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने अमावस्या, पितृ स्मरण और सेवा के महत्व को प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि पितरों का स्मरण केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने तथा जरूरतमंदों की सेवा का भाव है।
दानवीर कर्ण का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि कर्ण ने जीवनभर जरूरतमंदों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाया, लेकिन पितरों के नाम पर अन्न और जल का दान नहीं किया। कथा के अनुसार, स्वर्ग में उसे भोजन के स्थान पर सोना और रत्न प्राप्त हुए। कारण पूछने पर बताया गया कि पृथ्वी पर उसने धन-दौलत का खूब दान किया, लेकिन पितरों के लिए अन्न और जल अर्पित नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि दान के साथ अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता भी जरूरी है।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि तर्पण केवल पूर्वजों को जल अर्पित करना नहीं, बल्कि इस सत्य को स्वीकार करना है कि हमारा अस्तित्व हमसे पहले की पीढ़ियों से जुड़ा है। पितृ पक्ष में अन्नदान और जरूरतमंदों की सेवा इसी भावना का विस्तार है। किसी भूखे, असहाय, वृद्ध या दिव्यांग को भोजन कराना पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि बन सकता है।
नचिकेता-यमराज संवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि नचिकेता ने मृत्यु के रहस्य को जानने के लिए सांसारिक सुख-सुविधाओं तक को ठुकरा दिया था। यमराज ने उसे ‘श्रेय’ और ‘प्रेय’ का अंतर समझाया। जो अच्छा लगता है, वह हमेशा हितकारी नहीं होता और जो हितकारी होता है, वह हमेशा आसान नहीं होता। सही मार्ग चुनने के लिए प्रश्न पूछने और सत्य की खोज का साहस जरूरी है।
रामायण के जयंत प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि भगवान राम ने अपराध के प्रति कठोरता के साथ सुधार का अवसर देने की भावना भी दिखाई। श्राद्ध में कौए को पहला ग्रास देने की परंपरा प्रकृति और अन्य जीवों के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश देती है।
इस दौरान प्रशांत अग्रवाल ने संस्थान से कृत्रिम हाथ-पैर प्राप्त कर चुके दिव्यांगजनों से संवाद कर उनके अनुभव जाने। उन्होंने दिव्यांगजनों के जीवन में आए बदलाव, आत्मनिर्भरता की यात्रा और सेवा से मिले संबल के बारे में जानकारी ली।
उन्होंने आह्वान किया कि पितृ पक्ष में तर्पण और परंपराओं का पालन करने के साथ किसी जरूरतमंद को भोजन अवश्य कराया जाए। पितरों का स्मरण तभी सार्थक है, जब उनके नाम पर किया गया पुण्य किसी जरूरतमंद के जीवन में राहत, सम्मान और सहारा लेकर आए। कथा का सैकड़ों दिव्यांग लाभान्वित जनों एवं उनके परिजनों ने रसास्वादन किया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *