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205 गांवों की पहचान का संकट: न पूरी तरह ग्रामीण, न शहरी

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205 गांवों की पहचान का संकट: न पूरी तरह ग्रामीण, न शहरी

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तीन-तीन नियमों के जाल में उलझे हजारों परिवार; विकास और अधिकार दोनों अधर में
उदयपुर, 28 जून:
शहर का दायरा बढ़ने के साथ उदयपुर के आसपास के 205 गांव एक ऐसे प्रशासनिक संकट में फंस गए हैं, जहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन गांवों के लोग किस व्यवस्था के नागरिक हैं। ये गांव नगर विकास प्राधिकरण (यूडीए) की सीमा में शामिल हैं, लेकिन प्रशासनिक रूप से अब भी ग्राम पंचायतों के अधीन हैं। दूसरी ओर भवन निर्माण, भूमि उपयोग और विकास कार्यों के लिए अलग-अलग कानून और नियम लागू होने से आमजन लगातार परेशानी झेल रहे हैं।
स्थिति यह है कि एक साधारण मकान बनाने के लिए भी ग्रामीणों को ग्राम पंचायत, यूडीए और राजस्व विभाग जैसे कई कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कहीं पंचायत की अनुमति चाहिए तो कहीं यूडीए के नियम लागू हो जाते हैं। इससे न केवल समय और धन की बर्बादी होती है, बल्कि कई लोग कानूनी विवादों में भी उलझ जाते हैं।
विकास कार्यों की स्थिति भी इससे प्रभावित हो रही है। कई स्थानों पर सड़क, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, पेयजल और सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर यह स्पष्ट नहीं है कि जिम्मेदारी किस विभाग की है। नतीजा यह है कि कई योजनाएं वर्षों तक अधर में लटकी रहती हैं और ग्रामीणों को शहर के पास रहने के बावजूद शहरी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता।
पेराफेरी जिला संघर्ष समिति के संयोजक चंदन सिंह देवड़ा का कहना है कि जब तक इन 205 गांवों के लिए स्पष्ट और एकीकृत प्रशासनिक व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक यह भ्रम बना रहेगा। एक ओर सरकार शहरी विस्तार की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों को आज भी दोहरी-तिहरी व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है।
क्या हो सकता है समाधान?
एकीकृत नीति लागू हो ताकि 205 गांवों के लिए एक समान नियम और प्रशासनिक व्यवस्था हो।
सिंगल विंडो सिस्टम विकसित किया जाए, जहां भवन निर्माण, भूमि संबंधी अनुमति और अन्य सेवाएं एक ही स्थान पर मिलें।
विभागों की जिम्मेदारी स्पष्ट हो, ताकि विकास कार्यों में जवाबदेही तय हो सके।
विशेष अधिसूचना या अलग नीति बनाकर यूडीए, ग्राम पंचायत और राजस्व नियमों के टकराव को समाप्त किया जाए।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों से संवाद कर उनकी जरूरतों के अनुरूप व्यावहारिक मॉडल तैयार किया जाए।

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