LOADING

Type to search

विरासत की पुकार: गलियाकोट का ऐतिहासिक रामद्वारा संरक्षण को तरसता

Local

विरासत की पुकार: गलियाकोट का ऐतिहासिक रामद्वारा संरक्षण को तरसता

Share

सुभाष शर्मा
उदयपुर, 26 मार्च:
राजस्थान के डूंगरपुर जिले की सागवाड़ा तहसील स्थित गलियाकोट कस्बे में माही नदी के तट पर बना प्राचीन रामद्वारा इन दिनों अपनी जर्जर स्थिति को लेकर चिंता का विषय बना हुआ है। रामनवमी जैसे पावन अवसर पर जहां यहां श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ती है, वहीं सैकड़ों वर्ष पुराने भित्तिचित्र सीलन के कारण धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं, जो क्षेत्र की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए खतरे की घंटी है।
18वीं सदी की अनमोल चित्रकला हो रही धुंधली
रामद्वारा की दीवारों पर 1780 से 1810 ईस्वी के बीच बनाए गए भित्तिचित्रों में रामायण और महाभारत के जीवंत प्रसंग उकेरे गए हैं। इनमें राम-सीता स्वयंवर, राम बारात, श्रीकृष्ण की रासलीला, चीरहरण, माखनचोरी और दशावतार जैसे दृश्य शामिल हैं। वागड़ और गुजरात की लोकशैली में बने इन चित्रों में लाल, नीला, पीला, काला और सफेद रंगों का आकर्षक संयोजन देखने को मिलता है, जो अब नमी के कारण फीका पड़ता जा रहा है।
महंत जीवनदास की परंपरा आज भी जीवित
इतिहास के अनुसार विक्रम संवत 1815 (1758 ई.) में महंत जीवनदास ने इस मठ का कार्यभार संभालकर वैष्णव संप्रदाय का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने धार्मिक शोभायात्राओं, प्रवचनों और भजन-कीर्तन के माध्यम से लोगों को जोड़ा। आज भी रामद्वारा में प्रवेश करते ही दीवार पर उनका प्रवचन करते हुए भित्तिचित्र नजर आता है, हालांकि वह भी अब धुंधला हो चुका है।
रामनवमी और देवझुलनी एकादशी पर निकलती है भव्य शोभायात्रा
रामद्वारा में हर वर्ष रामनवमी और देवझुलनी एकादशी पर लकड़ी के राम रथ के साथ भव्य जुलूस निकाला जाता है। भजनों की स्वर लहरियों और जयकारों के बीच यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।


संरक्षण की दरकार, नहीं तो खो जाएगी धरोहर
‘डूंगरपुर राज्य की भित्ति चित्रांकन परम्परा: समाज और संस्कृति’ पुस्तक की लेखिका—इतिहासकार डॉ. मलिका बोहरा बताती है कि नदी के किनारे होने के कारण दीवारों में लगातार सीलन बढ़ रही है, जिससे भित्तिचित्र तेजी से नष्ट हो रहे हैं। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए प्रशासन से ठोस कदम उठाने की मांग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्वितीय कला और आस्था के संगम को देख सकें।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *