झीलों को फिर दिलानी होगी उनकी मूल पहचान
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‘प्लेजर सेंट्रिक’ सोच से बढ़ा संकट, झीलों को ‘प्रेयर सेंट्रिक’ दृष्टिकोण से देखने की जरूरत
उदयपुर, 31 मई: झीलों की नगरी उदयपुर में झीलों के बदलते स्वरूप और बढ़ते व्यावसायिक दबाव को लेकर चिंता जताई गई। मांजी मंदिर घाट पर आयोजित संवाद में वक्ताओं ने कहा कि झीलें केवल पर्यटन और मनोरंजन का केंद्र नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पारिस्थितिकीय धरोहर हैं। यदि उनकी मूल पहचान को नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।
व्यावसायीकरण से बिगड़ रहा संतुलन
झील विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि झीलों को सदियों से संस्कृति, प्रकृति और प्रगति के संगम के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन आज झीलों के प्रति दृष्टिकोण ‘प्रेयर सेंट्रिक’ के बजाय ‘प्लेजर सेंट्रिक’ हो गया है। झील किनारों पर बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियां पेयजल गुणवत्ता, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।
घाटों की पहचान भी खतरे में
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेजशंकर पालीवाल और शिक्षाविद कुशल रावल ने कहा कि झीलों के घाट कभी सामाजिक संवाद, आस्था और ज्ञान-विमर्श के केंद्र हुआ करते थे, लेकिन अब उनका स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पर्यटन जनित प्रदूषण और व्यावसायिक निर्माणों से झीलों का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
श्रद्धा और संरक्षण का संदेश
संवाद में समाजविद नंदकिशोर शर्मा, वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह, पर्यावरण प्रेमी विनोद कुमावत और रोहित चौबीसा ने झीलों के प्रति श्रद्धा, सेवा और सह-अस्तित्व के भाव को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने कहा कि झील संरक्षण को जनभागीदारी और सामाजिक जागरूकता से ही सफल बनाया जा सकता है।
